– बरुआरी पश्चिम में आयोजित शतचंडी महायज्ञ में श्रद्धा व भक्ति का अद्भुत संगम सुपौल. सदर प्रखंड अंतर्गत बरुआरी पश्चिम स्थित मां दुर्गा, दस महाविद्या, नवग्रह व कृष्ण मंदिर परिसर में आयोजित भव्य शतचंडी महायज्ञ के तीसरे दिन मंगलवार को भी श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था, श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रहा. मंदिर परिसर और यज्ञ स्थल पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबा हुआ नजर आया, जहां सुबह से देर शाम तक मंत्रोच्चारण, हवन-पूजन और देवी-देवताओं के जयकारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान रहा. शतचंडी महायज्ञ का संचालन सुप्रसिद्ध पौराणिक कथावाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री महाराज के निर्देशन में विधिवत रूप से किया जा रहा है. यज्ञ के तीसरे दिन भी दूर-दराज से आए सैकड़ों श्रद्धालु यज्ञ में सहभागिता करने और देवी की आराधना करने पहुंचे. श्रद्धालुओं में महिलाएं, पुरुष, युवा व बुजुर्ग सभी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे. शास्त्रीय विधि-विधान से संपन्न हुआ पूजा-अर्चना व आहुति यज्ञ स्थल पर सुबह से ही पूजा-अर्चना का क्रम प्रारंभ हो गया. उपाचार्य पवन पांडेय व ब्रह्मा शास्त्री हिमांशु त्रिपाठी द्वारा शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार मुख्य यजमान सहित अनेक यजमानों को विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करायी गयी. मंत्रोच्चारण के बीच यजमानों ने पूर्ण आहुति प्रदान की. यज्ञ में अग्निदेव को समर्पित आहुतियों के साथ वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक और सात्विक बना रहा. पूजन के दौरान यजमानों ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि, शांति, आरोग्यता और लोककल्याण की कामना की. आचार्यों द्वारा वेद मंत्रों व देवी सूक्तों के उच्चारण से उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे. श्रद्धालुओं का मानना है कि शतचंडी महायज्ञ से क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. देवी की कृपा से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं. देवी महिमा पर विशेष प्रवचन श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा वाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने कलयुग में देवी उपासना के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि शास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि कलयुग में दो देवताओं को संसार को समृद्धि देने का विशेष अधिकार प्राप्त है. “कालौ चंडी विनायकौ” इनमें प्रथम चंडी देवी और द्वितीय भगवान गणेश हैं. उन्होंने कहा कि कलयुग में देवी की आराधना सर्वाधिक फलदायी मानी गयी है. देवी शक्ति स्वरूपा हैं. संपूर्ण सृष्टि का संचालन उन्हीं की कृपा से होता है. आचार्य ने द्वापर युग में देवी के अवतार का पौराणिक वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को देवी के दिव्य स्वरूप से परिचित कराया. द्वापर युग में चंडी देवी का अवतार और विंध्याचल गमन की कथा कथा के दौरान आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने बताया कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण के अवतार के साथ ही देवी के अवतार का भी वर्णन शास्त्रों में मिलता है. गोकुल के राजा नंदराज जी की पत्नी यशोदा जी के गर्भ से चंडी देवी ने जन्म लिया. वहीं देवकी जी के गर्भ से संपूर्ण जगत के अधिष्ठाता भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया. वासुदेव जी ने अपने पुत्र श्रीकृष्ण को कंस के भय से गोकुल में नंद जी के यहां पहुंचा दिया. यशोदा जी की नवजात कन्या को लेकर कंस के कारागार में वापस आये. जब कंस ने उस कन्या को मारने का प्रयास किया. तब वह साध्वी प्रसूता नवजात कन्या कंस के हाथों से स्वयं को छुड़ाकर आकाश में स्थित हो गयी. आचार्य ने कहा कि आकाश में स्थित होकर देवी ने कंस को चेतावनी देते हुए कहा मूर्ख तू मुझे क्या मारेगा, तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है. अब तू बच नहीं पायेगा. इसके बाद देवी ने आठ भुजाओं का दिव्य स्वरूप धारण किया और विंध्यगिरी पर चली गईं. यही देवी विंध्याचली देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं. कलयुग की प्रत्यक्ष देवी और महादेवी का अंतिम अवतार कथा वाचक ने कहा कि यह महादेवी का द्वापर युग में अंतिम अवतार माना जाता है. यही देवी कलयुग की प्रत्यक्ष देवी है. वर्तमान शतचंडी महायज्ञ में जिन देवी की पूजा-अर्चना की जा रही है, वे ही समस्त जगत की अधिष्ठात्री देवी हैं. सभी देव व देवियों ने मिलकर कलयुग में संपूर्ण विश्व के पालन-पोषण का अधिकार इन्हीं देवी को प्रदान किया है. उन्होंने कहा कि देवी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने में समर्थ हैं. धन, पुत्र, धर्म, काम और मोक्ष जो कुछ भी मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के साथ देवी से मांगता है, उसे अवश्य प्राप्त होता है. यही कारण है कि कलयुग में देवी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है. नवरात्रि, चंडी पाठ और दुर्गा सप्तशती का विशेष महत्व आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने अपने प्रवचन में बताया कि चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रियों में देवी की विशेष पूजा की जाती है. इन दिनों देवी की आराधना से साधक को विशेष फल की प्राप्ति होती है. चंडी पाठ, श्री दुर्गा सप्तशती व देवी पाठ (श्री मद देवी भागवतम्) का पाठ-पारायण देवी उपासना में श्रेष्ठतम माना गया है. उन्होंने कहा कि यह विशेषता इस शतचंडी महायज्ञ की है कि यहां चंडी पाठ के साथ-साथ श्री दुर्गा सप्तशती और श्री मद देवी भागवतम् का विधिवत पाठ और पारायण किया जा रहा है. इससे यज्ञ का महत्व और भी बढ़ जाता है. क्षेत्र में आध्यात्मिक चेतना का विस्तार होता है. श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, भक्ति में डूबा पूरा क्षेत्र यज्ञ के तीसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण और यज्ञ दर्शन के लिए पहुंचे. महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में देवी गीत गाते हुए नजर आईं, वहीं पुरुष श्रद्धालु पूरे मनोयोग से कथा का श्रवण करते दिखे. बच्चों और युवाओं में भी यज्ञ और कथा को लेकर विशेष उत्साह देखा गया. स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने आयोजन समिति की व्यवस्थाओं की सराहना की. श्रद्धालुओं का कहना था कि इस प्रकार के धार्मिक आयोजनों से समाज में सकारात्मक सोच, आपसी सद्भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है. आयोजन समिति की भूमिका व व्यवस्थाएं आयोजन समिति द्वारा यज्ञ स्थल पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किये गये हैं. पेयजल, बैठने की व्यवस्था, स्वच्छता और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. समिति के अध्यक्ष सुनील कुमार यादव ने बताया कि आगामी दिनों में यज्ञ और कथा के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की संभावना है. कहा कि शतचंडी महायज्ञ और श्रीमद् भागवत कथा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि समाज में नैतिकता, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करना भी है. शतचंडी महायज्ञ पूरी भव्यता और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रहा है. आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री के प्रवचन से श्रद्धालु न केवल देवी की महिमा से परिचित हो रहे हैं, बल्कि अपने जीवन में धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी प्राप्त कर रहे हैं.
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