उदासीनता. जिले में एक गज भी नहीं बिछी बड़ी रेल लाइन की पटरियां
जिले में चार वर्षों से मेगा ब्लॉक के बावजूद अमान परिवर्तन का कार्य अपूर्ण है. कार्य रािश राशि आवंटन के बावजूद सुस्त गति से चल रहा है.
सुपौल : सुपौल जिले में रेल अमान परिवर्तन का कार्य अब तक लंबित है. वहीं रेल संबंधी अन्य परियोजनाओं का कार्य भी अधर में लटका है, जबकि सूबे के तकरीबन तमाम जिलों में बड़ी रेल लाइन की ट्रेनों का परिचालन प्रारंभ हो चुका है. सुपौल शायद सूबे का एक मात्र जिला है, जहां आज भी अंग्रेजों के जमाने की छोटी लाइन की ट्रेन चल रही है.
यह जिला रेल के विकास के मामले में पिछड़ा है. इसके कारण जिले के करीब 22 लाख की आबादी में असंतोष बढ़ता जा रहा है. लंबे समय से अमान परिवर्तन कार्य अधर में लटके रहने की वजह से लोगों के लिए बड़ी रेल लाइन का सपना अब दिवा स्वप्न बनता जा रहा है. रेलवे मंत्रालय के उदासीन रवैये से लोगों में रोष है. जो अब धीरे-धीरे आंदोलन का रूख अख्तियार कर रहा है.
13 साल बाद भी नहीं पूर्ण हुई परियोजना: गौरतलब है कि लोगों की समस्याओं के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा छह जून 2003 को जिले के निर्मली अनुमंडल मुख्यालय में कोसी रेल महासेतु व सहरसा-फारबिसगंज तथा सरायगढ़-सकरी के बीच रेल अमान परिवर्तन की नींव रखी गयी थी. परियोजना के मुताबिक वर्ष 2009 तक निर्माण कार्य पूर्ण होना था. शिलान्यास के बाद युद्ध स्तर पर कार्य भी प्रारंभ हुआ, लेकिन सरकार बदलते ही निर्माण कार्य सुस्त पड़ गया. नतीजा है कि शिलान्यास के 13 साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जिले में रेल की यह महत्वपूर्ण परियोजना अधर में लटकी हुई है.
इस बीच कोसी नदी पर रेल महासेतु का निर्माण कार्य तकरीबन पूरा हो चुका है, लेकिन बड़ी रेल लाइन की पटरियां नहीं बिछ पाने के कारण यह महासेतु अब तक बेकार पड़ा है.
चार वर्षों से लगा है मेगा ब्लॉक:
मालूम हो कि सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड में बड़ी लाइन के निर्माण के लिए राघोपुर-फारबिसगंज के बीच 20 जनवरी 2012 को रेल विभाग द्वारा मेगा ब्लॉक किया गया, लेकिन चार साल से अधिक बीत जाने के बावजूद इस खंड में अमान परिवर्तन का कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है.
वहीं एक नवंबर 2015 से थरबिटिया और राघोपुर स्टेशन के बीच मेगा ब्लॉक कर दिया गया. नतीजा है कि जिले के अधिकांश हिस्सों में छोटी रेल का परिचालन भी ठप पड़ गया है. जिसके कारण यात्रियों को मुश्किलें झेलनी पड़ती है.
मेगा ब्लॉक की वजह से सहरसा से सुपौल होते महज थरबिटिया स्टेशन तक छोटी लाइन की ट्रेन चल रही है. इधर सरायगढ़-निर्मली स्टेशन के बीच तो मिट्टी भड़ाई का कार्य भी अब तक अपूर्ण है, जिसकी वजह से खंडित मिथिलांचल के एकीकरण की उम्मीद धूमिल पड़ने लगी है.
छोटी लाइन की जर्जर पटरियां.
बेकार पड़ा रेल महासेतु.
आंदोलन के मूड में जनता
जिले में अमान परिवर्तन व रेल परियोजना की घोषणा तथा शिलान्यास के काफी वर्ष बीत जाने की वजह से जन मानस में असंतोष बढ़ता जा रहा है. शुरुआती दौर में इस बाबत रेल यात्री संघर्ष समिति का गठन कर लोगों द्वारा रेल संबंधी मांगों को लेकर कई बार धरना प्रदर्शन किया गया. वामदल सहित कई अन्य राजनीतिक दल व संगठनों ने संघर्ष किया. वर्तमान में जदयू कार्यकर्ताओं द्वारा लंबित रेल परियोजनाओं को पूर्ण करने की मांग को लेकर चार दिवसीय पद यात्रा प्रारंभ किया गया है.
हालांकि इस बीच जन प्रतिनिधियों ने भी पहल तेज की है. क्षेत्रीय सांसद रंजीत रंजन द्वारा मुद्दे को कई बार जोरदार तरीके से उठाया गया. इधर, स्थानीय विधायक सह बिहार सरकार के ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने भी रेल मंत्री सुरेश प्रभु से मिलकर रेल परियोजना को पूर्ण करने की मांग की है. वर्तमान वित्तीय वर्ष के बजट में निर्माण कार्य के लिए करोड़ों रुपये की राशि का आवंटन भी किया गया है, लेकिन बड़ी रेल लाइन निर्माण का कार्य अब भी अपेक्षित गति से नहीं हो रहा, जिसके कारण लोगों में निराशा का भाव व्याप्त है.
