गरीबों की थाली से सब्जी दूर

चिंता. महंगाई का कारण बन रही कृत्रिम विकास नीति पर चल रही अर्थव्यवस्था महंगाई ने तो पहले गरीबों की थाली से दाल गायब करवा दिया. साथ ही वर्तमान समय में आसमान छू रहे सब्जियों के भाव अधिकांश परिवारों के बजट से बाहर होते दिख रहा है. सुपौल : पहले तो महंगाई ने गरीबों की थाली […]

चिंता. महंगाई का कारण बन रही कृत्रिम विकास नीति पर चल रही अर्थव्यवस्था

महंगाई ने तो पहले गरीबों की थाली से दाल गायब करवा दिया. साथ ही वर्तमान समय में आसमान छू रहे सब्जियों के भाव अधिकांश परिवारों के बजट से बाहर होते दिख रहा है.
सुपौल : पहले तो महंगाई ने गरीबों की थाली से दाल गायब करवा दिया. साथ ही वर्तमान समय में आसमान छू रहे सब्जियों के भाव अधिकांश परिवारों के बजट को झकझोर कर रख दिया है. महंगाई कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का परिणाम है. भले ही कुछ कवि या व्यंग्यकार इस पर कवितायें और व्यंग्य लिखते हों पर सच यह है कि बढ़ती महंगाई समाज में एक खतरनाक विभाजन की तरफ दिख रही है.
दरअसल महंगाई यकीनन विकास का ही प्रतीक है पर वह स्वाभाविक होना चाहिए पर हम वर्तमान स्थिति पर नजर डालते हैं तो पता लगता है कि कृत्रिम विकास नीति पर अर्थव्यवस्था की दिशा व दशा पल रही है. जिस कारण महंगाई की गति अस्वाभाविक और असंतुलित ढंग से बढ़ रही है जो कि अंततः समाज ही नहीं बल्कि परिवारों का भी विभाजन करने पर तुली हुई है.
लोगों के बीच वैमनस्यता व कुंठाओं का कारण बन रही महंगाई : कुछ दशक पूर्व की स्थिति पर दृष्टिपात करें तो पहले परिवार और रिश्तेदारी में अमीर व गरीब होते थे. लेकिन उनमें अंतर इतना अधिक नहीं होता था कि विभाजन बाहर प्रकट हो. पहले एक अमीर के पास होता था अपना बड़ा मकान, भारी वाहन तथा अन्य महंगे सामान! जबकि गरीब के पास छोटा अपना या किराये का मकान, पुराना या हल्का तथा सस्ते सामान होते थे. यहां तक कि एक शादी विवाह के अवसर पर भी यही देखा जाता था कि एक आदमी अपनी शादी में अधिक प्रकार के व्यंजन परोसता था तो दूसरा कम. दो भाईयों में अंतर भी रहता था.
जहां एक भाई अपनी जेब से थोड़ा व्यय कर दूसरे के बच्चे में उसकी शान बढ़ाता था. पड़ोसियों में भी यही स्थिति थी. एक के घर में रेडियो है तो दूसरे के पास नहीं! पर दूसरा सुन कर ही आनंद लेता था.
सामाजिक सामूहिक अवसरों पर एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव था. परिवार, रिश्तेदारी और पड़ोस में रहने वाले लोगों में धन का अस्वाभाविक अंतर नहीं दिखाई देता था और जिस समाज पर हम गर्व करते हैं वह इसी का ही स्वाभाविक अर्थव्यवस्था का परिणाम था. मगर अब हालात यह है धन का असमान वितरण विकराल रूप लेता जा रहा है. इससे आपस में ही लोगों के कुंठायें और वैमनस्य का भाव बढ़ता जा रहा है. हम जब एकता या अखंडता की बात करते हैं तो एक बात भूल जाते हैं
कि अंततः यह एक भौतिक विषय है और इसे आध्यात्मिक आधारों पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता. हम भले ही जाति, भाषा, तथा धर्म के आधार पर बने समूहों की मजबूती में देश की एकता या अखंडता का भाव देखना चाहते हैं. लेकिन महंगाई के बढ़ते धन के असमान वितरण के भावनात्मक परिणामों को समझे बिना यह कठिन होगा क्योंकि अल्प धन वाला अधिक धनवान में प्रति कलुषिता का भाव रखने लगता है जो अंततः सामाजिक वैमनस्यता में बदल जाता है.
आय का स्तर स्थिर, लेकिन महंगाई में गुणात्मक बढ़ोतरी
गौरतलब हो कि बढ़ती महंगाई को लेकर सामाजिक अनुदारवाद को जिम्मेदार बताते हैं पर सच यह है कि इसके मूल में यही धन का असमान वितरण रहा है. जिन लोगों को यह बात अजीब लगे उन्हें यह देखना चाहिए कि हजार और पांच सौ नोट प्रचलन में आ गये हैं. वहीं अभी भी समाज में कितने लोग हैं जो उसके इस्तेमाल करने योग्य बन गये हैं. कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इस तरह के नोटों को केवल अवैध छिपाने वालों की सुविधा के लिये बनाया गया है. क्योंकि जिस तरह कुछ भ्रष्ट लोगों के यहां उनकी बरामदगी हुई उससे तो यही लगता है. दूसरा यह भी कि साइकिल तथा स्कूटर में हवा भरने के लिये आज भी दरें वही हैं. लेकिन सब्जियों तथा अन्य खाद्य पदार्थों की दरें में काफी बढ़ोतरी हुई हैं.
बीते माह व वर्तमान समय के सब्जी की कीमतों में हुए उतार चढ़ाव
नाम भाव प्रति किलो वर्तमान दर
परवल 30 35- 40
झींगा 15 20- 25
झिंगली 20 35- 40
करेला 20 25- 30
भिंडी 25 30- 35
फुल गोबी 80 90- 100
बंध गोबी 35 40- 45
बैगन 20 22- 25
मूली 20 20 – 24
टमाटर 40 50- 55
शिमला मिर्च 150 90 -100
बोरा 20 30 -35
चठेल 30 35 -40
खीरा 20 30- 35
चुकंदर 80 45- 50
हरी मिर्च 70 35 – 40
आलू 18 20- 22
प्याज 16 18- 20
अदरख 160 100- 120
कद्दू 25 रु़ 30 25 रु़

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