लापरवाही. उदासीनता के कारण नहीं बदल रही जिला मुख्यालय की सूरत
सौंदर्यीकरण को लेकर लाखों करोड़ों रुपये भी खर्च किये जा रहे हैं. बावजूद एसपी आवास के समीप से लोहिया नगर चौक तक की स्थिति काफी बदतर बना हुआ है.
सुपौल : सरकार द्वारा प्रखंड से लेकर जिला मुख्यालय के सौंदर्यीकरण कराये जाने को लेकर कवायद जारी है. साथ ही सौंदर्यीकरण को लेकर लाखों करोड़ों रुपये भी खर्च किये जा रहे हैं. बावजूद इसके अनुमंडल प्रशासन की उदासीनता के कारण जिला मुख्यालय स्थित एसपी आवास के समीप से लोहिया नगर चौक तक की स्थिति काफी बदतर बना हुआ है. यहां तक कि इस मुख्य मार्ग के दोनों किनारे की सरकारी भूमि पर फुटकर व रेहड़ी दुकानदार अपना आधिपत्य जमाये हुए हैं. जिस कारण जिला मुख्यालय के बाजार का स्वरूप फिलवक्त वही नजर आता है,
जो करीब चार दशक पूर्व इस अनुमंडल का रहा था. कस्बानुमा बाजार, बेतरतीब तरीके से सजी दुकानें, दुकान के आगे सड़क तक पसरा सामान, फुट-पाथ पर सजती सैकड़ों दुकानें, यत्र-तत्र खड़ी वाहन, पेयजल व शौचालय आदि का घोर अभाव सुपौल बाजार की पहचान बन चुकी है. आबादी के साथ ही वाहनों की संख्या में भी भारी वृद्धि हुई है. लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था के अभाव में शहर की गति में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हो रहा है. जिसके कारण बाजार क्षेत्र में जाम की समस्या आम हो चुकी है.
सरकारी जमीन पर सजती हैं फुटकर दुकानें :
स्थानीय बाजार में नीत दिन सड़कों पर सजने वाली सैकड़ों फुटकर दुकानें आम नागरिकों के लिये समस्या का कारण बनी हुई है. साथ ही ऐसे अवैध फुटकर दुकानदारों के कड़े तेवर रहने के कारण आये दिनों लोगों के साथ नोंक झोंक भी होता रहता है. स्थायी दुकानदार भी पहले की तरह आज भी दुकान के बाहर सड़कों की जमीन पर सामान पसारतें हैं.
जिस कारण सड़कें दिन ब दिन सिकुड़ती जा रही है. जिससे आम शहरियों को आवागमन में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. नगर परिषद द्वारा सड़कों से अतिक्रमण हटाने हेतु कई दफा अभियान चलाया गया. लेकिन प्रशासनिक महकमे की सुस्ती एवं परोक्ष रूप से वोट बैंक का राजनीति करने वाले राजनेताओं के हस्तक्षेप के कारण समस्या जस की तस बनी हुई है. साथ ही ऐसे दुकानदारों के हौसले भी बुलंद हो रहे हैं. जबकि शहर की खूबसूरती व सरकारी योजनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है.
नहीं दिख रही ट्रैफिक व्यवस्था : गौरतलब है कि स्थानीय लोहिया नगर चौक के समीप बस पड़ाव भी संचालित है. जहां से सहरसा, दरभंगा, वीरपुर सहित अन्य स्थानों के लिए छोटे बड़े वाहनों का परिचालन होता है. जिस कारण जिला मुख्यालय का सबसे व्यस्ततम चौराहा माना जाता रहा है. वर्ष 1991 में सुपौल को जिला का दर्जा मिलने के बावजूद जिला मुख्यालय स्थित बाजार के चौक-चौराहों पर आज तक ना तो ट्रैफिक पुलिस की तैनाती की गयी है
और ना ही बाजार क्षेत्र के ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार किया जा सका है. नतीजा है कि शहर में ना तो कोई यातायात का कानून लागू होता है और ना ही वाहनों की पार्किंग के लिये कोई सुदृढ़ व्यवस्था की जा सकी है. वाहन चालकों द्वारा सड़कों पर बेतरतीबी से वाहनों का परिचालन एवं यत्र-तत्र वाहन खड़ी करना यहां आम बात हो चुकी है. वाहनों के अव्यवस्थित परिचालन व पार्किंग के कारण बाजार क्षेत्र में अक्सर जाम की समस्या उत्पन्न होती है.
विफल साबित हो रहा नो इंट्री : ज्ञात हो कि स्थानीय बाजार क्षेत्र के बीचो-बीच एसएच 66 व एनएच 327 गुजरती है. नतीजा है कि सहरसा, पिपरा व सरायगढ़ स्थित फोर लेन एनएच 57 की ओर प्रतिदिन हजारों गाड़ियों का बाजार क्षेत्र से आवागमन होता है. समस्या के मद्देनजर करीब 06 साल पूर्व जिला प्रशासन द्वारा शहर में नो इंट्री का नियम लागू किया गया था. नियम के तहत सुबह 08 बजे से रात के 10 बजे तक भारी वाहनों का शहरी क्षेत्र में प्रवेश निषेध था. नियम को लागू करने के लिये शहर में प्रवेश करने वाले प्रमुख सड़कों पर बेरियर भी लगाया गया था.
साथ ही पुलिस बल की तैनाती भी की गयी थी. लेकिन समय के साथ ही नो इंट्री का यह कानून असफल साबित होता दिख रहा है. इसका प्रमुख कारण बाई पास सड़क की कमी मानी जाती है. नो इंट्री का कानून लागू नहीं हो पाने से शहरी क्षेत्र में दिन दहाड़े भाड़ी वाहनों का धड़ल्ले से प्रवेश जारी है. जो अक्सर जाम का कारण बनता है. लोहिया नगर स्थित रेलवे क्रासिंग पर ओवर ब्रीज का निर्माण नहीं हो पाने के कारण स्थिति और भी विकट बनती जा रही है.
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