जरा याद इन्हें भी कर लो...

अमरेंद्र, सुपौल : आजादी के गदर में 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम छोड़कर 78 अनुयायियों के साथ दौ सौ मील दूर समुद्र तट पर दांडी तक की पैदल यात्रा कर नमक आंदोलन प्रारंभ किया था. गांधी एवं उनके अनुयायियों ने समुद्र के जल से नमक बना कर अंग्रेजों का कानून तोड़ा […]

अमरेंद्र, सुपौल : आजादी के गदर में 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम छोड़कर 78 अनुयायियों के साथ दौ सौ मील दूर समुद्र तट पर दांडी तक की पैदल यात्रा कर नमक आंदोलन प्रारंभ किया था. गांधी एवं उनके अनुयायियों ने समुद्र के जल से नमक बना कर अंग्रेजों का कानून तोड़ा था. गांधी जी के इस कदम से देश वासियों में व्यापक रूप से राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ था. स्वयं सेवकों ने उत्साहित होकर अप्रैल, मई की गर्मी में भी जगह-जगह नमक बनाना शुरू कर दिया था. सुपौल जिला आजादी के मतवालों से तब अटा पड़ा था.

महान स्वतंत्रता सेनानियों की यह कर्म भूमि थी. कोसी के कछार एवं बीहड़ जंगलों की वजह से क्रांतिकारियों के लिये यह इलाका अनुकूल था. दुर्गम क्षेत्र होने की वजह से सिपाहियों के लिये यहां क्रांतिकारियों को ढूंढ़ना आसान नहीं था. गांधी जी के नेतृत्व में हजारों जिला वासी सड़कों पर उतर चुके थे.

अंग्रेजों की बर्बरता भी इन्हें झुकाने व डिगाने में कामयाब नहीं हो पा रही थी. कहा जाता है कि जब महात्मा गांधी ने नमक आंदोलन प्रारंभ किया तब तत्कालीन भागलपुर जिले में सर्व प्रथम सुपौल के कर्णपुर गांव में ही अप्रैल 1923 में नमक कानून तोड़ कर नमक बनाया गया था. कर्णपुर में नमक बनाने के दो स्थल थे.

पहला हनुमान घाट जो कर्णपुर मल्हनी सड़क के किनारे अवस्थित है. दूसरा स्थान गजना नदी के किनारे कलम बाग था. हनुमान घाट में इलाके के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र मिश्र उर्फ राजा बाबू के नेतृत्व में नमक बनाया गया था. प्रखर आंदोलन कर्मी शत्रुध्न प्रसाद सिंह, यमुना प्रसाद सिंह, राम बहादुर सिंह, चित नारायण शर्मा, शिव नारायण मिश्र, गंगा प्रसाद सिंह आदि भी आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे. लहटन चौधरी, चंद्र किशोर पाठन सहित सैकड़ों स्वयं सेवकों ने आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.

स्वाधीनता आंदोलन के इस क्षेत्र में क्रांतिकारियों का अहम योगदान था. राजाबाबू के अलावा खुबलाल मेहता, गढ़बरूआरी के गंगा प्रसाद सिंह, सुखपुर के रामेश्वर झा, बौकू कामत, तारणी प्रसाद सिंह, मल्हनी के काली प्रसाद सिंह, बतहन साफी, परसरमा के त्रिवेणी सिंह, यमुना प्रसाद सिंह, बीणा-एकमा के शैलेश मिश्र, दिगंबर ठाकुर, भूरा पासवान, बलहा के महेश्वर कामत, यमुना झा, खुशीलाल भगत, लालो चौधरी, जगतपुर के जयवीर झा,

कुलानंद मल्लिक, नेमुआ के ढ़लाय चौधरी, महुआ के मो सफीक, सोल्हनी के बटुक खां जैसे आजादी के मतवालों ने ब्रिटिश शासन की ईंट से ईंट बजा दी थी. कर्णपुर के शिव नारायण मिश्र उर्फ लाल बाबाजी जैसे अनेक सूरवीरों ने अंग्रेजों की भयानक यातनाएं सही. लेकिन अपने उद्देश्यों से कभी नहीं डिगे.

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