पारिश्रमिक का भी नहीं हुआ भुगतान
सुपौल : मैट्रिक परीक्षा की काॅपियों के मूल्यांकन में जिला मुख्यालय स्थित दोनों मूल्यांकन केंद्रों पर बोर्ड के निर्देश की धज्जियां उड़ायी गयी. बोर्ड की ओर से मूल्यांकन के लिए 10 दिनों का समय निर्धारित किया गया था. वहीं सुपौल में 20 से 25 दिनों तक काॅपियों की जांच की गयी. सूत्रों की मानें तो इसके पीछे सेटिंग-गेटिंग व काॅपी जांच के दौरान खर्च राशि के नाम पर बिहार बोर्ड को चूना लगाने का था, जबकि बोर्ड द्वारा मूल्यांकन के लिए अवधि विस्तार नहीं किया गया.
पारिश्रमिक राशि को रखा प्राइवेट बैंक में : एक बड़ी गड़बड़ी की बू इस बात से भी आ रही है कि काॅपी की जांच हुए डेढ़ माह से अधिक होने को है. लेकिन, बोर्ड द्वारा राशि उपलब्ध करा दिये जाने के बावजूद परीक्षकों को पारिश्रमिक का भुगतान नहीं किया गया है. जबकि, निकटवर्ती जिले में मूल्यांकन समाप्त होने के कुछ दिन बाद ही परीक्षकों को पारिश्रमिक का भुगतान कर दिया गया. सूत्रों की मानें तो इसके पीछे दो वजह है. बोर्ड की ओर से अब तक अवधि विस्तार नहीं किया गया है. वहीं विलंब से पारिश्रमिक का भुगतान करने पर बैंक में रखी गयी राशि का ब्याज मुनाफे के रूप में केंद्र निदेशक को प्राप्त होगा. यही वजह है कि राशि को प्राइवेट बैंक में रखा गया है.
काॅपी आवंटित करने में हुई मनमानी
बिहार बोर्ड के निर्देशानुसार मूल्यांकन कार्य में लगाये गये परीक्षकों को प्रतिदिन समान रूप से जांच के लिए काॅपी आवंटित किया जाना था. लेकिन, मूल्यांकन केंद्र निदेशक व मुख्य परीक्षक की ओर से परीक्षकों को समान रूप से जांच के लिए काॅपी उपलब्ध नहीं करायी गयी. किसी परीक्षक को कम तो किसी परीक्षक को अधिक काॅपी आवंटित कर जांच कार्य कराया गया. जबकि, बोर्ड का स्पष्ट निर्देश था कि सभी परीक्षक प्रतिदिन 35 से 40 काॅपी का मूल्यांकन करेंगे तथा सभी परीक्षकों को बराबर-बराबर काॅपी उपलब्ध कराया जायेगा.
