मधेशियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नेपाल के हित में नहीं : आनंद मोहन फोटो -14कैप्सन- आनंद मोहन का फाइल फोटोप्रतिनिधि, सुपौलनेपाल में मधेशियों के साथ जो कुछ हो रहा है, वह न्यायोचित नहीं है. आधी आबादी की आवाज को कुंद करना नेपाल सरकार के लिए असंभव है. मधेशियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नेपाल के हित में नहीं है. नेपाल के उच्च पदों पर बैठे राजनेता जितनी जल्द इस बात को समझें, उतना ही श्रेयस्कर होगा. यह बातें पूर्व सांसद आनंद मोहन ने शुक्रवार को मुजफ्फरपुर कोर्ट में एक मुकदमे में पेशी से वापस सहरसा लौटने के क्रम में कहीं.श्री मोहन ने कहा कि नेपाली जनता के राजशाही के खिलाफ संघर्ष में पूर्व पीएम चंद्रशेखर जी के निर्देश पर लोकतांत्रिक व जनवादी शक्तियों को हमने साथ दिया था. पर, वर्तमान हालात पर भारत सरकार की रहस्यमयी चुप्पी और नेपाल सरकार का अहंकारी बरताव अखरने वाला है. लंबे संघर्ष में 50 से अधिक मधेशी व दो भारतीय नागरिक शहीद हो चुके हैं. एक दशक पूर्व मधेशी आंदोलन के बाद तत्कालीन नेपाल सरकार ने जो वादे किये थे, उससे मुकरना मधेशी हितों की अनदेखी व वर्तमान हालात के लिए जिम्मेवार है. श्री मोहन ने कहा कि यह कितनी बड़ी नाइंसाफी है कि 52 फीसदी आबादी वाले मधेशियों की लोकतांत्रिक संस्थाओं में मात्र दो प्रतिशत भागीदारी है. कहा कि जहां पहाड़ी क्षेत्र में छह हजार की आबादी पर सांसद चुने जाते हैं, वहीं तराई क्षेत्र में एक लाख की आबादी पर सांसद का चयन होता है. लोकशाही में मधेशियों के साथ जो सलूक हो रहा है, उससे बेहतर तो राजशाही ही थी. उन्होंने कहा कि नेपाल सरकार को समय रहते सोचना चाहिए कि पाकिस्तान के शासकों के भेदभावपूर्ण सोच और नीतियों के कारण ही बांग्लादेश का जन्म हुआ. भारत सरकार में भी तिब्बत का उदाहरण मौजूद है. उन्होंने भारत सरकार की उदासीनता पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो कि तिब्बत की तरह नेपाल भी भारत के हाथ से फिसल कर चीन के शिकंजे में चला जाये. लिहाजा भारत सरकार को तत्काल मधेशियों की समस्या के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाना चाहिए.
मधेशियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नेपाल के हित में नहीं : आनंद मोहन
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