27 किलोमीटर की सफर में लग रहा दो घंटा

27 किलोमीटर की सफर में लग रहा दो घंटा फोटो – 3कैप्सन – ट्रेन पर सफर करते यात्री प्रतिनिधि, सुपौल रेल मंत्रालय की उपेक्षा की वजह से सहरसा- फारबिसगंज रेल खंड में अमान परिवर्तन का कार्य अब तक लंबित पड़ा है. जिले वासियों के लिए बड़ी रेल लाईन सपना ही बना हुआ है. सूबे का […]

27 किलोमीटर की सफर में लग रहा दो घंटा फोटो – 3कैप्सन – ट्रेन पर सफर करते यात्री प्रतिनिधि, सुपौल रेल मंत्रालय की उपेक्षा की वजह से सहरसा- फारबिसगंज रेल खंड में अमान परिवर्तन का कार्य अब तक लंबित पड़ा है. जिले वासियों के लिए बड़ी रेल लाईन सपना ही बना हुआ है. सूबे का शायद एक मात्र लंबा रेल खंड है जो आजादी के 68 साल बाद भी अंग्रेज जमाने की छोटी लाइन मौजूद है. जिस पर चलने वाली छोटी लाइन की ट्रेनों का सफर लोगों के लिए हमेशा दुश्वारियों से भरा साबित होता है. रेल मंत्रालय की उदासीनता के कारण लोगों में व्यापक असंतोष व्याप्त है.छह जोड़ी ट्रेनों का है परिचालन सहरसा – सुपौल व राघोपुर के बीच महज छह जोड़ी ट्रेनों का परिचालन हो रहा है. इनमें से अधिकांश ट्रेनों में महज पांच बोगियां ही होती है. जिसके कारण इन ट्रेनों पर यात्रियों की भारी भीड़ होती है. 22 लाख की आबादी वाला इस जिले में पांच बोगियों वाले मात्र छह ट्रेनों का परिचालन लोगों के समझ से परे है. भेड़ – बंदरियों की तरह ट्रेनों में सफर करना यात्रियों की नियति बन चुकी है. ट्रेन का समय सारणी भी ऐसा बनाया गया है कि सहरसा से दूर दराज क्षेत्र के लिए खुलने वाली किसी भी महत्वपूर्ण ट्रेन के लिए इस रेल खंड से सटीक मेल नहीं दिया गया है. नतीजतन यात्रियों को घंटों पूर्व सहरसा पहुंच कर प्रतीक्षा करने की विवशता होती है.आजिज करने वाली ट्रेनों की गति सहरसा- सुपौल व राघोपुर तक परिचालित ट्रेनों की गति लोगों के लिए समस्या का कारण बना हुआ है. यह सुन कर लोगों को आश्चर्य लग रहा है कि इस रेलखंड पर चलने वाली रेलगाड़ी की गति महज 12 से 17 किलोमीटर प्रति घंटा है. यही वजह है कि सहरसा से सुपौल की 27 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब दो घंटे का समय लगता है. वहीं सहरसा से राघोपुर रेलखंड की दूरी 63 किलोमीटर निर्धारित है. जहां यात्रियों को सफर पूरी करने में चार घंटे का समय व्यतीत करना पड़ता है. स्थिति यह है कि ट्रेन में सुरक्षा व्यवस्था नदारद है जिस कारण यात्रियों को चेन पुलिंग का भी सामना करना पड़ता है. भारी भीड़ के बीच कछुए की चाल से चलने वाली ट्रेन में यात्रा की यातना का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.सड़क मार्ग को प्राथमिकता दे रहे यात्री इस रेलखंड की ट्रेनों में मौजूद भीड़, सुस्त रफ्तार, कुव्यवस्था सहित नदारद सुरक्षा व्यवस्था की वजह से अधिकांश संभ्रांत परिवारों के लोग ट्रेन में यात्रा करने से कन्नी काटने लगे हैं. इस वर्ग के लोग अपनी खुद की या फिर किराये पर वाहन लेकर सहरसा का आवाजाही करना पसंद करते हैं. जबकि आम लोग सहित गरीब व लाचार यात्रियों को आज भी कुव्यवस्था से लबालब व मंथर गति से चलने वाली ट्रेन में सफर करने की विवशता बनी हुई है.

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