siwan news : नेताओं के वायदों में सिमटकर रह गया ””राजेंद्र कुष्ठ सेवाश्रम””

siwan news : चुनावी शोर में गुम हुआ राजेंद्र बाबू का धरोहरकभी सारण प्रमंडल के कुष्ठ मरीजों के लिए एम्स था राजेंद्र कुष्ठ सेवाश्रम

सीवान. चुनावी मंचों पर विकास के दावे गूंज रहे हैं, लेकिन सीवान का एक ऐसा संस्थान है, जो नेताओं के आश्वासनों की भेंट चढ़कर अब खंडहर बन चुका है.

यह वही राजेंद्र कुष्ठ सेवाश्रम है, जिसे देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 11 नवंबर 1954 को मैरवा प्रखंड के अनुग्रह नगर में स्थापित किया था. एक समय सारण प्रमंडल के कुष्ठ रोगियों के लिए यह अस्पताल ””एम्स”” के समान था, लेकिन आज इसकी इमारतें जर्जर हैं और मरीजों की जगह सन्नाटा पसरा है. बताया जाता है कि स्थापना के बाद मुख्य संचालक समाजसेवी जगदीश दीन एवं संचालन सदस्यों की मौत एवं सरकारी सहायता बंद होने के बाद इसके बुरे दिन शुरू हो गये.

राजनीतिक वादों में ही सीमित रह गया पुनर्निर्माण

पिछले 12 वर्षों से इस परिसर में मेडिकल कॉलेज खोलने का वादा नेताओं के भाषणों की शोभा बढ़ा रहा है. स्थानीय सांसद से लेकर बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री तक कई जनप्रतिनिधियों ने जीर्णोद्धार का भरोसा दिलाया, लेकिन अब तक ””एक ईंट”” भी नहीं रखी गयी. समाजसेवी द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय तक गुहार लगायी गयी, रिपोर्टें बनीं, फाइलें चलीं, पर नतीजा सिफर रहा. चुनाव आते हैं, तो सेवाश्रम की चर्चा गर्म हो जाती है, चुनाव जाते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है.

कभी जीवनदान देने वाला संस्थान, अब जर्जर इमारतों का ढेर

करीब 40 एकड़ में फैले इस संस्थान में कभी 200 बेड की व्यवस्था थी, सर्जरी यूनिट, पैथोलॉजी यूनिट और फिजियोथेरेपी सेंटर थे. यहां से 45 हजार से अधिक मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटे, जबकि हजारों को पुनर्वास प्रशिक्षण भी मिला. हेलीपैड और वीआइपी गेस्ट हाउस तक की व्यवस्था वाले इस अस्पताल में कभी राष्ट्रपति जाकिर हुसैन और नीलम संजीव रेड्डी जैसे गण्यमान्य अतिथि पहुंचे थे. लेकिन, संचालक मंडल के निधन के बाद विभागीय उपेक्षा ने इसे मृतप्राय कर दिया. भवनों में झाड़ियां, टूटी खिड़कियां और जंग खाई खामोशी ही बची है. कभी जहां मरीजों की भीड़ लगी रहती थी, वहां अब सरकारी लापरवाही की निशानियां हैं.

चुनाव में मुद्दा, बाकी वक्त में भुला दिया गया संस्थान

स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि ””क्या डॉ राजेंद्र प्रसाद के सपनों की यह धरती सिर्फ चुनावी मंचों की शोभा बनेगी?”” सारण प्रमंडल के इस ऐतिहासिक अस्पताल का अस्तित्व बचाना केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उस विरासत को बचाना सभी की जिम्मेदारी है, जिसे राजेंद्र बाबू ने अपने हाथों से गढ़ा था.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Shailesh kumar

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >