सीतामढ़ी में भू-जल स्तर की निगरानी के लिए पहल, बथनाहा में बनेगा सेंसर युक्त अन्वेषण कुआं

भारत सरकार के केंद्रीय भू-जल बोर्ड द्वारा सीतामढ़ी में भू-जल स्तर की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है. बथनाहा में सेंसर युक्त अन्वेषण कुआं का निर्माण किया जा रहा है, जिससे जलस्तर की वास्तविक स्थिति का पता चलेगा. यह कदम भविष्य के जल संरक्षण योजनाओं को मजबूत आधार देगा.

Declining groundwater level: सीतामढ़ी जिले के विभिन्न इलाकों समेत बथनाहा प्रखंड में गिरते भू-जल स्तर की निगरानी व वैज्ञानिक अध्ययन के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण पहल शुरू की गयी है. बथनाहा के माध्यमिक सह प्लस टू विद्यालय परिसर में भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के केंद्रीय भू-जल बोर्ड (सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड) द्वारा एक्सप्लोरेटरी (अन्वेषण) कुआं का निर्माण कराया जा रहा है. इस अत्याधुनिक कुआं के माध्यम से भू-जल स्तर की लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी.

सेंसर तकनीक से होगी जलस्तर के उतार-चढ़ाव की निगरानी

मौके पर मौजूद भू-गर्भ शास्त्री मिथिलेश कुमार ने बताया कि उत्तर बिहार के विभिन्न प्रखंडों में इस तरह के अन्वेषण कुओं का निर्माण कराया जा रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में भू-जल की सटीक स्थिति, जलस्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव और भविष्य की जल संबंधी चुनौतियों का वैज्ञानिक आकलन करना है. इस कुआं में विशेष संवेदी यंत्र (सेंसर) लगाए जाएंगे, जिससे जलस्तर की गतिविधियों का रियल-टाइम डाटा लगातार प्राप्त होता रहेगा. यदि किसी क्षेत्र में वाटर लेवल में लगातार गिरावट दर्ज की जाएगी, तो वैज्ञानिकों की विशेष टीम मौके पर पहुंचकर इसके कारणों का गहरा अध्ययन और आवश्यक अनुसंधान करेगी.

हर साल गर्मी में गहराता है जल संकट

गौरतलब है कि बथनाहा प्रखंड समेत जिले के परिहार, बाजपट्टी, सोनबरसा, मेजरगंज, रीगा और डुमरा आदि प्रखंडों के सैकड़ों गांवों में गर्मी के मौसम में भू-जल स्तर तेजी से नीचे चला जाता है. इसके कारण हर वर्ष सैकड़ों चापाकल पूरी तरह सूख जाते हैं और स्थानीय आबादी को भीषण पेयजल संकट का सामना करना पड़ता है. पूर्व में इस समस्या को लेकर ग्रामीण प्रखंड कार्यालयों पर विरोध-प्रदर्शन भी कर चुके हैं.

जल संरक्षण की योजनाओं को मिलेगा बेहतर आधार

इस वैज्ञानिक पहल को लेकर स्थानीय लोगों में काफी उम्मीदें हैं. ग्रामीणों का कहना है कि इस अन्वेषण कुआं के क्रियाशील होने से क्षेत्र में भू-जल की वास्तविक और सटीक स्थिति का समय पर पता चल सकेगा. इससे प्रशासनिक स्तर पर समय रहते जल संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने में मदद मिलेगी. साथ ही, वैज्ञानिक निगरानी के जरिए भविष्य में आने वाले जल संकट से निपटने के लिए बनाई जाने वाली सरकारी योजनाओं को भी एक मजबूत और सटीक तकनीकी आधार मिल सकेगा.


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लेखक के बारे में

रतिकांत पिछले करीब 17 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर कार्यरत हैं. उन्हें राजनीति, धर्म-अध्यात्म, पर्व-त्योहार, अपराध, सामाजिक सरोकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं जैसे बहुआयामी विषयों पर लगातार सटीक रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव प्राप्त है.

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