आज मिट्टी के दीये व कृतिम रौशनियों से नहलाएगा हर एक घर-आंगन व देवस्थल
सीतामढ़ी :धनतेरस के साथ शुक्रवार से शुरू पांच दिवसीय दीपोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को जिले भर में श्रद्धालुओं ने छोटी दीवाली मनायी. छोटी दीवाली को नकर निवारण चतुर्दशी भी कहा जाता है.
इस अवसर पर जिले के सैकड़ों महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने व्रत-उपवास रखकर ईश्वर से नर्क से मुक्ति की कामना की. वहीं, आज रविवार को सत्य की जीत व आध्यात्मिक अज्ञानता को दूर करने वाला दीपोत्सव का महापर्व दिवाली मनायी जाएगी. जिले में इस दीवाली को भी यादगार बनाने की पूरी तैयारी की गई है.
लोगों ने शनिवार को भी दीवाली को लेकर जमकर खरीदारी की. सुबह से ही बाजारों में खरीदारी को लेकर हलचल तेज हो गयी थी. शहर से लेकर ग्रामीण बाजार भी सुबह से सज गया था. कपड़ा बाजार सुबह से देर रात तक गुलजार रहा. इसके अलावा लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं व सजावटों की दुकानों पर सुबह से देर रात तक ग्राहकों का तांता लगा रहा. जिला प्रशासन की ओर से भी दिवाली को खुशियों का त्योहार बनाने को लेकर सभी जरूरी तैयारी की गयी है.
रामायण काल से मनाया जाता है दीपावली : मान्यता है कि दीपोत्सव का पांच दिवसीय त्योहार दीपावली रामायण काल से ही मनाया जाता है. शास्त्रानुसार, भगवान राम जब 14 वर्ष के बनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने उनके अयोध्या लौटने की खुशी में दीपोत्सव का त्योहार दीपावली मनायी थी.
तभी से भारत समेत दुनिया भर में फैले हिंदू सनातन धर्मावलंबी दीपावली का त्योहार धूमधाम से मनाते आ रहे हैं. इस अद्भुत त्योहार में घर-आंगन, बगीचा, खलिहान, छत व सड़कों समेत मंदिरों व देवस्थलों को मिट्टी के दीयों की पंक्तियों से प्रकाशित की जाती है. वहीं, घरों को रंगों व मोमबत्तियों से सजाया जाता है.
रंगोलियां सजायी जाती है. आस्था पूर्वक लक्ष्मी-गणेश, मां काल व मां तारा की पूजा-अर्चना भी की जाती है. मान्यता है कि इस दिन दशो द्वार खुला होता है. इस दिन कोई भी शुभ काम अति फलदायक होता है. यही कारण है कि नया व्यापार शुरू करने वाले कारोबारी अपने संस्थान या प्रतिष्ठान का शुभारंभ दीपावली को करना पसंद करते हैं.
विशेष लाभ के लिए इस तरह मनायें िदवाली : आचार्य पंडित मुकेश कुमार मिश्र के अनुसार दीपावली को लक्ष्मी पूजन के दौरान लाल वस्त्र, लाल फूल एवं लाल नैवेद्य जरूर चढ़ाना चाहिए. यह अति लाभदायक होता है. जिनके माता-पिता दिवंगत हो चुके हैं, उन्हें इस रात अपने माता-पिता को याद करना चाहिए और प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए. हर किसी को कम से कम पांच दीया जरूर जलाना चाहिए, इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर सुख-वैभव की प्राप्ति के लिए आशीष देतीं हैं.
श्री गणेश को मोदक या लड्डू का भोग जरूर लगाना चाहिए. वहीं, स्वयं या किसी ब्राह्मण से विधि-विधान के साथ मां लक्ष्मी एवं श्री गणेश की पूजन कराने के साथ ही श्री गणेश स्तोत्र एवं कनक धारा या श्रीसूक्त का पाठ करना या कराना चाहिए. यह हर मनोकामना सिद्ध करने वाला प्रयोग माना जाता है. वहीं, दरिद्रता से मुक्ति के लिए मध्य रात्रि के बाद हर एक घर में सूप बजाना चाहिए. मान्यता है कि चार बजे भोर में उठकर घर-आंगन व खेत-खलिहानों में सूप बजाने से दरिद्रता से मुक्ति मिलती है.
दीपावली की रात कालीदास बने थे सकल शास्त्र के ज्ञाता : दीपावली की मध्य रात्रि को काली व मां तारा का प्रादुर्भाव हुआ था. अत: इस दिन जगह-जगह मां काली एवं मां तारा की पूजा-आराधना विधि-विधान के साथ की जाती है. शास्त्रानुसार दीपावली की मध्य रात्रि को ही महाकवि कालीदास ने मां काली को प्रसन्न करने में सफल हुए थे.
कहा जाता है कि मां काली महाकवि कालीदास की भक्ति से प्रसन्न होकर दीपावली की मध्य रात्रि को ही अपना आशीर्वाद प्रदान की थीं. कालीदास ने उस रात जिन वेद-शात्र, पुराणों एवं उपनिषदों के पन्नों को छू लिया, वह उन्हें कंथस्थ हो गया और वे सकल शास्त्र के ज्ञाता बन गये थे.
