Sasaram News : प्राकृतिक खेती से आय और पर्यावरण को लाभ

प्राकृतिक खेती आज किसानों के लिए न केवल आय बढ़ाने का जरिया है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी सबसे प्रभावी उपाय बन चुकी है.

बिक्रमगंज. प्राकृतिक खेती आज किसानों के लिए न केवल आय बढ़ाने का जरिया है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी सबसे प्रभावी उपाय बन चुकी है. इसी सोच को मजबूत करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र बिक्रमगंज में सोमवार से पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की गयी. इसका उद्देश्य जीविका की कृषि सखियों को प्राकृतिक, जैविक और स्थायी कृषि पद्धतियों से प्रशिक्षित करना है, ताकि वे गांव-स्तर पर किसानों को मार्गदर्शन दे सकें. कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्र प्रधान आरके जलज ने किया. उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोतों की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है. ऐसी स्थिति में प्राकृतिक खेती किसानों को कम लागत में अधिक लाभ दिलाने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित खेती का रास्ता खोलती है. उद्घाटन सत्र में डॉ रामाकांत सिंह ने जीवामृत, घनजीवामृत और वर्मी कंपोस्ट जैसी तकनीकों की विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने कहा कि इनसे मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ती है और फसल उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है. वहीं, डॉ रतन कुमार ने फल व सब्जी उत्पादन में प्राकृतिक खेती के फायदे, बीज उपचार, मल्चिंग और लागत कम करने के तरीकों पर प्रकाश डाला. उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि किस प्रकार किसान बिना रसायन के भी बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. कार्यक्रम में हरेंद्र कुमार, सुबेश कुमार और प्रवीन कुमार सहित केवीके की पूरी टीम मौजूद रही. विशेषज्ञों ने प्रशिक्षणार्थियों से संवाद करते हुए उन्हें कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा बतायी. प्रशिक्षण में सासाराम, नौहट्टा, रोहतास, संझौली, तिलौथू, नासरीगंज और चेनारी प्रखंड से चयनित 30 कृषि सखियां भाग ले रही हैं. सभी प्रतिभागियों ने इसे व्यवहारिक व उपयोगी बताते हुए गांव-गांव में लागू करने का संकल्प लिया. यह प्रशिक्षण 12 सितंबर तक चलेगा और प्रतिदिन अलग-अलग विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित होंगे. बोले अधिकारी…… कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी आरके जलज ने बताया कि सोमवार से शुरू किया गया पांच दिवसीय प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण में जीवामृत बीजामृत व घनजीवामृत की निर्माण विधि, स्थानीय संसाधनों का उपयोग, फसल विविधीकरण व चक्र प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और कीट व रोग नियंत्रण की जैविक विधियों की जानकारी दी जायेगी.

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