छपरा. जयप्रकाश विश्वविद्यालय में स्थापित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में प्राचार्य और अर्थपाल की नियुक्ति से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. न्यायमूर्ति रितेश कुमार की एकल पीठ ने 24 जुलाई को पारित आदेश में कहा कि किसी शिक्षक को उसकी सहमति के बिना दूसरे कॉलेज में प्रतिनियुक्त करना कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है.
राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव को दाखिल करना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने इस मामले में पूर्व के न्यायिक फैसलों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए बिहार के राज्यपाल के अपर मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अदालत के हस्तक्षेप के बाद याचिका दायर करने वाले शिक्षकों ने न्याय मिलने की उम्मीद जताई है.
28 नए राजकीय डिग्री कॉलेजों में हुई थी नियुक्ति
जानकारी के अनुसार छपरा, सीवान और गोपालगंज क्षेत्र में हाल ही में 28 नए राजकीय डिग्री कॉलेजों की स्थापना की गई है. इन कॉलेजों में विश्वविद्यालय के अंगीभूत कॉलेजों में कार्यरत वरीय शिक्षकों को प्राचार्य और अर्थपाल के पद पर प्रतिनियुक्त किया गया था.
नौ कॉलेजों में शिक्षकों ने नहीं दिया योगदान
बताया गया कि 28 राजकीय डिग्री कॉलेजों में से आठ कॉलेजों में प्राचार्य और एक कॉलेज में अर्थपाल के पद पर प्रतिनियुक्त शिक्षकों ने अब तक योगदान नहीं दिया है. इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से संबंधित शिक्षकों के वेतन पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया गया.
शिक्षकों ने वेतन रोकने के आदेश को बताया गलत
शिक्षकों का पक्ष है कि बिना उनकी सहमति के उन्हें दूसरे कॉलेजों में प्रतिनियुक्त किया गया. उन्होंने कहा कि वे अपने मूल कॉलेज में कार्य कर रहे थे, इसके बावजूद वेतन रोकने का आदेश जारी करना उचित नहीं है. इसी मामले को लेकर शिक्षकों ने अलग-अलग याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की थीं.
डॉ कमाल अहमद की याचिका पर हाईकोर्ट ने किया हस्तक्षेप
अर्थपाल पद पर प्रतिनियुक्त किए गए डॉ. कमाल अहमद की याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने मामले में हस्तक्षेप किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षक की सहमति के बिना दूसरे कॉलेज में प्रतिनियुक्ति करना उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है.
अन्य शिक्षकों की याचिकाओं पर भी जारी है सुनवाई
इस मामले में अन्य शिक्षकों द्वारा दायर याचिकाओं पर भी अलग-अलग तिथियों में सुनवाई चल रही है. शिक्षकों को उम्मीद है कि न्यायालय के फैसले से उनकी समस्याओं का समाधान होगा.
