मां का सजा दरबार, पाठ के बाद आरती करते श्रद्धालु.

ग्रामीण इलाकों में भी लाखों की लागत से हो रहा है पंडाल का निर्माण डोरीगंज (छपरा) : ग्रामीण इलाकों में भी लाखों की लागत से भव्य पूजा पंडालों का निर्माण कराया जा रहा है. जहां विभिन्न पूजा समितियां पंडाल निर्माणकर्ता के कारीगरों के साथ अपनी सोच से अलग-अलग पंडालों को आकर्षक रूप देने की मुहिम […]

ग्रामीण इलाकों में भी लाखों की लागत से हो रहा है पंडाल का निर्माण

डोरीगंज (छपरा) : ग्रामीण इलाकों में भी लाखों की लागत से भव्य पूजा पंडालों का निर्माण कराया जा रहा है. जहां विभिन्न पूजा समितियां पंडाल निर्माणकर्ता के कारीगरों के साथ अपनी सोच से अलग-अलग पंडालों को आकर्षक रूप देने की मुहिम में दिन रात जुटे हुए है तो दूसरी ओर पंडालों के आस-पास पूजा सामग्रियों, मिष्ठानों व खिलौने की सज रही अस्थायी दुकानों की बदौलत गांवों में अभी से ही इस आयोजन को लेकर हर चेहरे से एक अलग ही उत्साह देखा जा रहा है. आस्था व चहल-पहल के बीच गांवों की सूरत भी बदली-बदली सी नजर आ रही है जो खासकर बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए है. डोरीगंज बाजार स्थित भैरोपुर चौक, महारागंज, तीनमहुआ एनएच के समीप लालबाजार, खलपुरा, चौपाल विष्णुपुरा बाजार तथा शेरपुर महारानी आदि स्थानों पर लाखों की लागत से आयोजकों के पंडालों को भव्य रूप देने की तैयारियां जोरों पर है.
पंडाल व प्रतिमाओं के निर्माण में कलाकार बिखेर रहे अपना हुनर
पंडालों से लेकर प्रतिमाओं के निर्माण व साज सज्जा में कही स्थानीय तो कही बाहरी कलाकार अपना हुनर साबित करने में दिन-रात लगे हुए है. डोरीगंज बाजार स्थित भारत माता दूर्गा-पूजा समिति के अध्यक्ष धुरेन्द्र प्रसाद ने बताया कि हर साल बजट कुछ बढता ही जा रहा है. पिछले साल पंडाल के निर्माण में कुल 80 हजार की लागत आयी थी.
जो इस बार उसी मॉडल के निर्माण में एक लाख पैतीस हजार की लागत आ रही है. पंडाल व मूर्तियों के कारीगर बाहर से बुलाये गये. वही शेरपुर महावीरी पूजा समिति के अध्यक्ष कृष्णा सिंह व दुर्गापूजा समिति के अध्यक्ष शुभनारायण राय ने बताया कि प्रतिमाओं के निर्माण के लिए मूर्तिकार बंगाल से बुलाये गये है. वही पंडालों का निर्माण स्थानीय कलाकार ही लगाये गये है.
जिसमें पंडालों के निर्माण लाइटिगं व प्रतिमाओं को आकर्षक रूप देने में दो से ढाइ लाख की लागत आ रही है. सदस्यों ने बताया कि कलश स्थापना के दिन से ही यहां दुकानें सजने लगती है. इलाके के लोग इसे छोटा मीना बाजार के भी नाम से जानते है. जहां सप्तमी से दशमी तक मेले जैसा दृश्य होता है. जिसके लिए समिति की ओर से जगह जगह वालंटियरों की तैनाती की जाती है.

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