Samastipur News:समस्तीपुर : रंगकर्मी, कवि-लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सफदर हाशमी के शहादत दिवस पर शुक्रवार को स्टेशन चौक स्थित गांधी स्मारक परिसर में स्मृति-सभा का आयोजन किया गया. जनवादी लेखक संघ , जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा तथा सीआईटीयू के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित स्मृति-सभा की अध्यक्षता जनवादी लेखक संघ के जिला अध्यक्ष शाह ज़फ़र इमाम ने की. संचालन जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के जिला सचिव चन्द्रेश्वर राय ने किया. सबसे पहले सभी उपस्थित लेखकों, संस्कृति कर्मियों एवं बुद्धिजीवियों ने सफदर हाशमी के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. स्मृति सभा को सीआईटीयू के जिला सचिव मनोज कुमार गुप्ता, खेतिहर मजदूर यूनियन के राज्य संयुक्त सचिव रामाश्रय महतो,किसान सभा के जिला सचिव सत्य नारायण सिंह,एटक के जिला अध्यक्ष सुधीर कुमार देव, जनवादी लेखक संघ के जिला सचिव डॉ. अरुण अभिषेक, सुरेश राम एवं शमशाद आलम, एसएफआई के जिला सचिव छोटू कुमार भारद्वाज, जन संस्कृति मंच के जिला सचिव अमलेन्दु कुमार, किसान सभा के नेता उपेन्द्र राय, सीपीआई (एम) के समस्तीपुर लोकल कमेटी सचिव उपेन्द्र राय, खेतिहर मजदूर यूनियन के जिला अध्यक्ष राम सागर पासवान,जनवादी महिला समिति की नेत्री मीना कुमारी, पेंशनर्स एसोसिएशन के आनन्दी राय एवं प्रगतिशील लेखक संघ के शंकर प्रसाद साह सहित कई लेखकों, संस्कृति कर्मियों ने संबोधित किया. इस मौके पर सांस्कृतिक मोर्चा के रामप्रीत सहनी एवं नरेन्द्र कुमार टुनटुन ने क्रांतिकारी गीत पेश किये. कार्यक्रम में राम प्रकाश यादव दिनेश राय, डॉ. श्याम कांत महतो, डॉ. पवन कुमार पासवान, कासिम सबा, अनिल कुमार, हरे कृष्ण रजक, भिखारी भास्कर, कुंवर प्रसाद सहनी,राम नारायण पासवान सहित दर्जनों की संख्या में लेखक ,संस्कृति कर्मी एवं बुद्धिजीवी शामिल हुये. अपने अध्यक्षीय भाषण में शाह ज़फ़र इमाम ने कहा कि सफदर एक व्यक्ति नहीं, विचारधारा का नाम है. एक व्यक्ति को तो मारा जा सकता है लेकिन विचारधारा को मारना संभव नहीं है. सफदर ने नुक्कड़ नाटक को आम जनता से सीधे संवाद का माध्यम बनाया. देश के विभिन्न हिस्सों में आज भी हजारों की संख्या में सफदर के वसूलों पर चलने वाले कलाकार एवं संस्कृति कर्मी हैं. विदित हो कि 01 जनवरी 1989 को दिल्ली से करीब चालीस किलोमीटर दूर साहिबाबाद के झंडापुर कस्बे में ””””हल्ला बोल”””” नाटक करते समय स्थानीय गुण्डों ने उनकी टीम पर हमला कर दिया, जिसमें रायबहादुर नामक मजदूर की मौत हो गई और अपने साथियों को बचाने में क्रम में सफदर पर भी जानलेवा हमला किया गया और 02 जनवरी 1989 को दिल्ली के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई. उस समय से हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में लेखक, संस्कृति कर्मी एवं बुद्धिजीवी विभिन्न माध्यमों से सफदर को याद करते हुए उनकी विचारधारा को मजबूत करने का संकल्प लेते हैं.
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