Samastipur : अनुकूल मौसम को देख वैज्ञानिक ने की रबी फसलाें के बीजों की अनुशंसा

वैज्ञानिकों ने मौसम की अनुकूलीय परिस्थियों को देखते हुये किसानों के लिये रबी फसल बोआई के लिये बीजों की अनुशंसा की है.

– न्यूनतम तापमान के सामान्य 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक कम होने के आसार समस्तीपुर . डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मौसम की अनुकूलीय परिस्थियों को देखते हुये किसानों के लिये रबी फसल बोआई के लिये बीजों की अनुशंसा की है. वैज्ञानिक के अनुसार मौसम पूरी तरह शुष्क रहेगा. वहीं तापमान भी गेहूं सहित अन्य फसलों की बोआई के लिये पूरी तरह अनुकूल है.अगले 19 नवंबर तक अधिकतम तापमान 25 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है.वहीं न्यूनतम तापमान, सामान्य तापमान से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस कम रह सकता है और इसके 13-15 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की संभावना है. सापेक्ष आद्रर्ता सुबह में 85 से 95 प्रतिशत तथा दाेपहर में 70 प्रतिशत रहने की संभावना है. वैज्ञानिक ने किसानों को सुझाव दिया है कि गेहूं की बोआई के लिए तापमान तथा अन्य मौसमीय परिस्थितियां अनुकूल है. किसान सिंचित एवं समयकालीन गेहूं की किस्मों की बोआई प्राथमिकता से करें. खेत की तैयारी के समय 150-200 क्विटल कम्पोस्ट, 60 किलोग्राम नेत्रजन, 60 किलोग्राम फॉस्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटास प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करें. वैज्ञानिक ने गेहूं की एचडी-2967, एचडी-2733, एचडी -2824, डीडब्लू-187, डीडब्लू- 039, एचयुडब्लू- 468, सीबीडब्ल्यू-38 किस्में उत्तर बिहार के लिए अनुशंसित है. बीज को बोआई से पहले 2.5 ग्राम बेबीस्टीन की दर से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें. छिटकबां विधि से बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 125 किलोग्राम तथा सीड ड्रील से पंक्ति में बोआई बोआई के लिए 100 किलोग्राम बीज का व्यवहार करें.चना की बोआई के लिए मौसम अनुकूल है. बोआई के समय 20 किलोग्राम नेत्रजन, 45 किलोग्राम फॉस्फोरस, 20 किलोग्राम पोटास तथा 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से व्यवहार करें. चना के लिए उन्नत किस्म पूसा-256, केपीजी-59(उदय) तथा पूसा 372 अनुशंसित है. बीज को बेबीस्टीन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. 24 घंटा बाद उपचारित बीज को कजरा पिल्लू से बचाव हेतु क्लोरपाईरीफॉस 8 मिली प्रति किलोग्राम की दर से मिलावें. पुन: 4 से 5 घंटे छाया में रखने के बाद राईजोबीयम कल्चर (पांच पैकेट प्रति हेक्टेयर) से उपचारित कर बोआई करें. वैज्ञानिक ने कहा है कि आलू की कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी अशोका, कुफरी बादशाह, कुफरी ज्योति, कुफरी सिंदुरी, कुफरी अरुण, राजेन्द्र आलू-1,राजेन्द्र आलू-2 तथा राजेन्द्र आलू-3 इस क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्में है. बीज दर 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रखें. पंक्ति से पंक्ति की दूरी 50-60 सेमी एवं बीज से बीज की दूरी 15-20 सेमी रखें. आलू को काटकर लगाने पर 2 से 3 स्वस्थ आंख वाले टुकड़े को उपचारित कर 24 घंटे के अन्दर लगावें. बीज को एगलाॅल या एमीसान के 0.5 प्रतिशत घोल या डाइथेन एम-45 के 0.2 प्रतिशत घोल में 10 मिनट तक उपचारित कर छाया में सुखाकर रोपनी करें. समूचा आलू (20-40 ग्राम) लगाना श्रेष्ठकर है. खेत की जुताई में कम्पोस्ट 200-250 क्विटल, 75 किलोग्राम नेत्रजन, 90 किलोग्राम फॉस्फोरस एवं 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें. किसान पिछेती धान की कटाई कर राई की पिछेती किस्में राजेन्द्र अनुकूल, राजेन्द्र सुफलाम तथा राजेन्द्र राई पिछेती की बाेआई कर सकते हैं. राई–तोरी–सरसों की फसल जो 15 से 20 दिनों की हो गयी है उसमें निकौनी तथा बछनी कर पौधे से पौधे की दूरी 12 से 15 सेमी रखें. मक्का, मटर, मसूर एवं राजमा की 20 से 25 दिनों की फसलों में कजरा (कटुआ) पिल्लू की निगरानी करें. इस कीट के पिल्लू रात्रि के समय निकलकर इन फसलों के छोटे-छोटे उग रहे पौधों पर चढ़कर पत्तियों तथा कोमल शाखाओं को काटकर खाती है एवं जमीन पर गिरा देती हैं जिससे पूरा पौधा ही सूख जाता है. यह पिल्लू अधिकतर दिन में भूमि के अन्दर दरारों में या ढ़ेलों के नीचे छिपी रहती है और इन कटी शाखाओं को जमीन के अन्दर ले जाकर दिन में भी खाती है. यह खाती कम नुकसान अधिक करती है. इसकी रोकथाम के लिए खेत की सिंचाई करने पर इसके पिल्लू दरार से बाहर निकलते हैं एवं पक्षियों द्वारा शिकार हो जातें हैं. खड़ी फसलों में बीच–बीच में घास–फूस के छाेटे-छोटे ढेर शाम के समय लगा देते हैं. रात्रि में यह कीट फसलों को खाकर इसी ढेर में छिप जाते हैं. किसान सुबह में छिपे पिल्लू को चुनकर नष्ट कर देतें हैं. अधिक नुकसान होने पर क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी दवा का 2.5 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

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