Samastipur News:भोजपुरी विषय में छात्रों की रूची नहीं, स्नातक भोजपुरी की 225 सीट रिक्त

भोजपुरी संघर्ष की भाषा है और इसकी सुगंध श्रम के माध्यम से पूरी दुनिया में फैला हुआ है. आज भी हमारे यहां के मांगलिक कार्य इसी भाषा में रचित गीत के माध्यम से ही संपन्न होते हैं

Samastipur News: समस्तीपुर : भोजपुरी संघर्ष की भाषा है और इसकी सुगंध श्रम के माध्यम से पूरी दुनिया में फैला हुआ है. आज भी हमारे यहां के मांगलिक कार्य इसी भाषा में रचित गीत के माध्यम से ही संपन्न होते हैं. बावजूद छात्र भोजपुरी में पढ़ाई को लेकर उत्साहित नहीं हैं और अपनी मातृभाषा के संरक्षण के लिए आगे नहीं आ रहे हैं. लनामिवि के स्नातक प्रथम सेमेस्टर (सत्र 2025-29) में भोजपुरी विषय में नामांकन के लिए एक भी आवेदन नहीं मिले. स्नातक भोजपुरी की 225 सीट रिक्त रहना वाकई चिंता का विषय है. छात्र नेता मुलायम सिंह यादव बताते है कि यह भोजपुरी का दुर्भाग्य ही है कि आज सीट रिक्त पड़े हैं और छात्र-छात्राएं भोजपुरी विषय में रुचि नहीं ले रहे हैं. कुछेक काॅलेजों में यह पहल भोजपुरी बोलने वाले छात्रों को एक सहज और प्रभावी शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई है. महिला कॉलेज के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो विजय कुमार गुप्ता ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन जैसे अध्येता ने आजादी से पहले 1940 के दशक में ही पुरजोर तरीके से भोजपुरी क्षेत्र में भोजपुरी माध्यम से शिक्षा देनी की मांग को उठाया था. जहां तक मैथिली भाषा का सवाल है, तो इसके माध्यम से 1973 तक स्कूलों में पढ़ाई लिखाई चलती रही. उस वक्त सभी विषयों की किताबें मैथिली में होती थीं. मगर हाल के दशकों में धीरे-धीरे बिहार में इन लोकभाषाओं को हाशिये पर डाल दिया गया. अब तक स्कूलों में मैथिली जरूर एच्छिक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, भोजपुरी की पढ़ाई सीधे कॉलेज के स्तर पर होती है. राज्य में अब सिर्फ हिंदी, संस्कृत, उर्दू और बांग्ला माध्यम से पढ़ाई होती है. मैथिली, मगही और भोजपुरी ऐसी बिहारी भाषाएं हैं जिनका बड़ा विस्तृत दायरा है. बोलने वालों की आबादी के हिसाब विश्व की 100 प्रमुख भाषाओं में इनकी गिनती होती है. इनमें भोजपुरी जहां 32वें स्थान पर है, मैथिली 43वें और मगही 64वें स्थान पर आती हैं. महिला कॉलेज की स्नातक छात्रा प्रिया बताती है कि आज के बदले माहौल में लोग मैथिली, भोजपुरी या मगही जैसी भाषाओं के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा लेना शायद ही पसंद करें. क्योंकि इससे उनके कैरियर में आगे बढ़ने की संभावना कम हो जायेगी. सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा दशरथ तिवारी कहते है कि नई शिक्षा नीति में सबसे अधिक जोर स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई पर है तो बिहार सरकार को अपना यह टाल-मटोल वाला रवैया छोड़ना चाहिए और आगे बढ़कर इस मांग को स्वीकार करना चाहिए. इसी में राज्य के लाखों बच्चों की भलाई है. भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से भारत की भाषाई समावेशिता और संप्रभुता और अधिक मजबूत होगी.

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Published by: Ankur kumar

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