Samastipur College Dispute: कॉलेज में शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ के बैनर तले जारी धरना-प्रदर्शन के बीच एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.एक तरफ जहां आंदोलनकारी कर्मचारी कॉलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ महाविद्यालय के प्राचार्य ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (एलएनएमयू) के कुलसचिव को एक गोपनीय व तीखी रिपोर्ट भेजकर पूरे आंदोलन की मंशा पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.इस रिपोर्ट के बाद कॉलेज परिसर से लेकर विश्वविद्यालय मुख्यालय तक हड़कंप मच गया है क्योंकि इसमें बिना हिसाब दिए लाखों रुपये डकारने का जिन्न बाहर आ गया है.
बिना वाउचर लाखों रुपये रफा-दफा करने का खेल, प्राचार्य ने नामों के साथ किया खुलासा
प्राचार्य की ओर से कुलसचिव को भेजे गए पत्र में आंदोलन को एक सोची-समझी साजिश बताया गया है. पत्र के अनुसार, इस धरने का मुख्य उद्देश्य वित्तीय नियमों को ताक पर रखकर वर्षों पहले ली गई भारी-भरकम अग्रिम (एडवांस) राशि का अवैध रूप से समायोजन कराना है. प्राचार्य ने पत्र में बकायदा उन कर्मचारियों के नामों और राशियों का खुलासा किया है, जिन्होंने कॉलेज फंड से लाखों रुपये तो लिए, लेकिन सालों बाद भी उसका हिसाब नहीं दिया. आंकड़ों के अनुसार वरुण कुमार मिश्रा पर 11 लाख 10 हजार रुपये, प्रमोद कुमार पर 6 लाख 30 हजार रुपये, लिपिक अमरेंद्र कुमार पर 3 लाख रुपये, संजीव कुमार सिंह पर 1 लाख 35 हजार रुपये, शिवनारायण राय पर 1 लाख रुपये व नथुनी यादव पर 77 हजार रुपये का बकाया है. आरोप है कि ये लोग बिना उचित वाउचर और हिसाब दिए इस राशि को रफा-दफा कराने के लिए धरने के नाम पर दबाव बना रहे हैं.
कर्मचारियों की हुंकार- तानाशाही के खिलाफ आर-पार की जंग, परीक्षाएं बाधित होने की आशंका
दूसरी ओर, धरने पर बैठे कर्मचारियों ने प्राचार्य के इन वित्तीय अनियमितता के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे कॉलेज प्रशासन का 'तानाशाही रवैया' करार दिया है. यूनियन के नेताओं ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा. इस रार के बीच कॉलेज का शैक्षणिक माहौल बिगड़ने की आशंका गहरा गई है. प्राचार्य ने कुलसचिव को सचेत किया है कि वर्तमान में कॉलेज में इग्नू की जून सत्र की परीक्षाएं चल रही हैं और विश्वविद्यालय की मुख्य परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं. ऐसे में धरने के कारण प्रशासनिक कार्य बाधित हो सकते हैं, इसलिए विश्वविद्यालय तुरंत हस्तक्षेप कर कठोर कानूनी व अनुशासनात्मक कार्रवाई करे.
