समस्तीपुर. महंगाई के आगे आमदनी बौनी हो जाती है. चाहे कितना भी कमाओ घरेलू बजट पूरा नहीं हो पाता. अगर उधार न मिले तो पता नहीं दिन कैसे कटे. शहर के गोला बाजार स्थित एक दुकान में रोजमर्रे की जरुरतों को पूरा करने के लिए खरीदारी करने पहुंची सीमा और शोभा कुछ यूं ही बयां कर गयी. उनका कहना था कि रोज बाजार आना पड़ता है. बच्चों की जरुरत अलग होती है. बाजार से लौट कर घर पहुंचने पर उनके खिले चेहरे थोड़े सामान देख कर कैसे बुझ जाते हैं यह तो कोई कम आमदनी वाले बाल बच्चेदार ही जाने. साबुन, तेल, चीनी, करुआ तेल, चावल, दाल, आटा, हरी सब्जी को खरीदते वक्त पता चलता है कि कीमत आसमान को छेद कर कहां पहुंच गया है. वैसे पिछले कुछ दिनों में कीमत थोड़ा स्थिर रह रहा है. साग-सब्जियों की कीमत भी नरम हुई है. लेकिन इससे पूरी तरह लोगों को राहत नहीं मिला है. उपर से अच्छे स्कूल का खर्च जो पढावे सो जाने. सरकार को देश की अधिकतर आबादी को ध्यान में रख कर ही बजट पेश करना चाहिए ताकि सर्वहारा वर्ग को अधिक से अधिक राहत मिले. लेकिन इच्छा से क्या होता है. नीति नियंता तो ऊपर बैठकर तय कर देते हैं. झेलना हम जैसों को पड़ता है.
महंगाई काबू में रहे तो सेहत खुद होगा बुलंद
समस्तीपुर. महंगाई के आगे आमदनी बौनी हो जाती है. चाहे कितना भी कमाओ घरेलू बजट पूरा नहीं हो पाता. अगर उधार न मिले तो पता नहीं दिन कैसे कटे. शहर के गोला बाजार स्थित एक दुकान में रोजमर्रे की जरुरतों को पूरा करने के लिए खरीदारी करने पहुंची सीमा और शोभा कुछ यूं ही बयां […]
