पड़ोसियों में खीर बांटकर लोगों ने मनाया था जश्न

95 वर्षीया जानकी नहीं भूली हैं आजादी के नारे लड़ाई के लिए हर महीने दान करते थे चार आने समाज में बढ़ रहे अपराध से आहत हैं जानकी देवी मोहनपुर :15 अगस्त 1947 की सुबह में ही आकर किसी ने बताया कि बीती रात आजादी मिल गयी. वह सुबह किसी बड़े पर्व से भी ज्यादा […]

95 वर्षीया जानकी नहीं भूली हैं आजादी के नारे

लड़ाई के लिए हर महीने दान करते थे चार आने
समाज में बढ़ रहे अपराध से आहत हैं जानकी देवी
मोहनपुर :15 अगस्त 1947 की सुबह में ही आकर किसी ने बताया कि बीती रात आजादी मिल गयी. वह सुबह किसी बड़े पर्व से भी ज्यादा महवपूर्ण लगी. घर में मिट्टी के बर्तन में रखा सरसों का तेल निकाला गया. पूरियां बनी. भैंस के दूध में खीर बनाकर पड़ोसियों को बांटी गयी. यह कहना है स्वतंत्रता संग्राम में खास भूमिका निभा चुके दानी पंडित की 95 वर्षीया पत्नी जानकी देवी का. दानी पंडित तब के नामी स्वतंत्रता सेनानियों के अत्यंत प्रिय पात्र रहे थे.
वह कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे. स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हर महीने कोष में चार आने दान करते रहे थे. हर दिन स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के नाम एक मुट्ठी अनाज भी निकालते रहे थे. दानी पंडित ने स्वतंत्रता सेनानी को मिलने वाला पेंशन लेना मंजूर नहीं किया था. उनका 2007 की 31 जनवरी को देहांत हो गया था.
लेकिन स्वंतत्रता संग्राम में दानी पंडित की सक्रियता से डरती रही जानकी देवी के आंखों में 15 अगस्त 1947 की वह सुबह आज भी याद है. वह बताती है कि पूरे परिवार को ही नहीं गांव भर को दानी पंडित की आजादी की लड़ाई में सक्रियता से डर लगता था. लोग यह समझते थे कि आजादी मिलेगी ही नहीं. जब दानी पंडित के घर के आसपास गोरे पलटन की घोड़ों की टाप सुनानी पड़ती थी तो सभी लोग सहम जाते थे. जानकी देवी की आंखों में आज भी कई बड़े सूरमाओं के चेहरे जीवित है.
लेकिन वे उन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम याद नहीं कर पा रहीं. सिर्फ महात्मा गांधी से संबंधित नारों एवं गीतों की पंक्तियां सुनाती हैं. जानकी देवी बताती है कि आजादी मिलने के बाद जैसे भले न थे, लेकिन महंगाई भी नहीं थी. दो आने का एक मन कोई भी अनाज मिल जाता था. जबकि मच्छलियां, दूध एवं घी बहुत सस्ते में मिलते थे. सड़कें नहीं थी. आवागमन के साधन भी नहीं थे. लेकिन आजादी मिलने के बाद लोगों को डर भी नहीं लगता था.
आज आतंकवादी घटनाओं, महंगाई एवं आपसी सद्भाव के अभाव से बहुत ही आहत हैं. वह बहुत चिंतित होकर बताती हैं कि आज के वक्त में लोगों को अपने लोगों से डर लगताहै.कदाचित इस समय के बारें में आजादी के दीवानों से सोचा भी नहीं था़ प्रखंड की धरणीपट्टी पश्चिमी पंचायत के बरूआ गांव में जानकी देवी आज भी 72 साल पूर्व मिली आजादी के पहले दिन को याद कर रोमांचित हो जाती है.

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