3 सितंबर नहाय-खाय, 4 को जन्माष्टमी और 5 को विसर्जन, सुगमा में अभी से भक्तिमय हुआ माहौल

बनमा ईटहर के सुगमा गांव में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर भक्ति और उत्साह का माहौल है. 3 सितंबर से शुरू होकर 5 सितंबर तक चलने वाले इस उत्सव में 56 भोग, नहाय-खाय और प्रतिमाओं की अनोखी पारंपरिक सजावट खास आकर्षण हैं.

Sugama Janmashtami 2026: बनमा ईटहरी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर सुगमा गांव में अभी से भक्ति और उत्साह का माहौल बन गया है. सहुरिया पंचायत के सुगमा गांव के वार्ड संख्या एक और दो में मंदिरों से लेकर गलियों तक तैयारियां तेज हो गयी हैं. कहीं पंडाल तैयार किया जा रहा है, तो कहीं मूर्तिकार राधा-कृष्ण सहित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.

लेकिन सुगमा की जन्माष्टमी सिर्फ पूजा और मेले तक सीमित नहीं है. यहां की सबसे खास बात प्रतिमाओं को सजाने की वर्षों पुरानी परंपरा है. कलाकार बाजार से तैयार रंग खरीदकर प्रतिमाओं पर नहीं लगाते. वे पारंपरिक तरीके से खुद रंग तैयार करते हैं और फिर उन्हीं रंगों से प्रतिमाओं को सजाया जाता है.

यही परंपरा सुगमा की जन्माष्टमी को आसपास के इलाकों से अलग पहचान देती है.

3 सितंबर को नहाय-खाय, 4 को जन्माष्टमी

इस वर्ष सुगमा में जन्माष्टमी को लेकर तीन दिनों तक धार्मिक आयोजन होंगे. 3 सितंबर को नहाय-खाय, 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और 5 सितंबर को प्रतिमाओं का विसर्जन किया जायेगा.

नहाय-खाय के दिन भगवान को 56 प्रकार के भोग लगाने की परंपरा है. जन्माष्टमी के दिन पूजा-अर्चना के साथ भव्य जागरण और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे.

5 सितंबर को विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का भावपूर्ण विसर्जन किया जायेगा.

राधा-कृष्ण से बलराम-रुक्मिणी तक बन रही प्रतिमाएं

गांव में इस बार भी राधा, कृष्ण, बलराम, रुक्मिणी सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं.

मूर्तिकार राजेश सिंह, कृष्ण मोहन, शंभू सिंह और फुलो यादव सहित अन्य कलाकार दिन-रात प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हैं.

सुगमा में प्रतिमा निर्माण की जिम्मेदारी विशेष रूप से अमेठिया परिवार द्वारा करायी जाती है. मिट्टी और आकार देने के शुरुआती काम से लेकर प्रतिमाओं की सजावट तक कलाकार बारीकी से काम कर रहे हैं.

मूर्तिकारों के लिए यह केवल काम नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है.

बाजार के तैयार रंग नहीं, कलाकार खुद बनाते हैं रंग

सुगमा की जन्माष्टमी पूजा की सबसे खास पहचान प्रतिमाओं की सजावट है.

यहां प्रतिमाओं को रंगने के लिए बाजार में मिलने वाले तैयार रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. कलाकार पारंपरिक तरीके से खुद रंग तैयार करते हैं और फिर प्रतिमाओं को रंग-रूप देते हैं.

इस प्रक्रिया में समय और मेहनत दोनों अधिक लगते हैं, लेकिन यही परंपरा प्रतिमाओं को स्थानीय पहचान देती है.

बदलते समय में जब त्योहारों की सजावट के लिए बाजार से तैयार सामग्री आसानी से उपलब्ध है, तब भी सुगमा के कलाकार अपनी पुरानी परंपरा को बनाए हुए हैं.

दोनों ठाकुरबाड़ियों की भी है अलग पहचान

सुगमा गांव की दोनों ठाकुरबाड़ियां भी अपनी अलग विशेषता के लिए जानी जाती हैं.

स्थानीय लोगों के अनुसार, दोनों स्थानों पर बांस के ध्वज सालों भर हरे-भरे रहते हैं. इसे लेकर आसपास के क्षेत्रों में भी चर्चा होती है.

ग्रामीणों की इन ठाकुरबाड़ियों के प्रति गहरी आस्था है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं और भगवान को बांसुरी चढ़ाते हैं. इसी आस्था के कारण जन्माष्टमी के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है.

रक्षाबंधन से ही शुरू हो जाता है भजन-कीर्तन

सुगमा में जन्माष्टमी का माहौल जन्माष्टमी वाले दिन से अचानक नहीं बनता. इसकी शुरुआत रक्षाबंधन के दिन से ही हो जाती है.

गांव की अलग-अलग कीर्तन मंडलियों की ओर से भजन-कीर्तन शुरू कर दिया जाता है. धीरे-धीरे पूरा गांव भक्तिमय वातावरण में डूबने लगता है.

मंदिरों में साफ-सफाई और रंग-रोगन के साथ भव्य पंडाल निर्माण का काम भी तेजी से चल रहा है. आयोजकों की तैयारी है कि जन्माष्टमी के दिन मंदिर परिसर को आकर्षक रूप दिया जाये.

सुगमा का जन्माष्टमी मेला है सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल

सुगमा के जन्माष्टमी मेले की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. यह मेला सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी माना जाता है.

ग्रामीणों के अनुसार, हिंदू-मुस्लिम सहित सभी समुदायों के लोग यहां भगवान के दर्शन करने पहुंचते हैं और मेले के आयोजन में भी सहयोग करते हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से आयोजित हो रहे इस मेले के दौरान आज तक किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं हुई है.

यही आपसी सहयोग और भाईचारा इस आयोजन को खास बनाता है.

मेले को लेकर अभी से बढ़ी चहल-पहल

जन्माष्टमी में अभी कुछ दिन बाकी हैं, लेकिन सुगमा के वार्ड संख्या एक और दो में चहल-पहल बढ़ गयी है.

मंदिरों की सफाई, रंग-रोगन, पंडाल निर्माण और प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम एक साथ चल रहा है. कलाकार प्रतिमाओं की सजावट में जुटे हैं, वहीं कीर्तन मंडलियां धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारी कर रही हैं.

गांव के लोगों को अब 4 सितंबर का इंतजार है, जब भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ सुगमा में जन्माष्टमी मेले का मुख्य आयोजन होगा.

इसके अगले दिन 5 सितंबर को प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ तीन दिवसीय आयोजन का समापन होगा.

Sugama Janmashtami 2026: पूजा से आगे है सुगमा की जन्माष्टमी की कहानी

सुगमा की जन्माष्टमी की खासियत सिर्फ भव्य प्रतिमाएं या धार्मिक आयोजन नहीं हैं. इसकी असली पहचान उन स्थानीय परंपराओं में है, जिन्हें ग्रामीण पीढ़ियों से आगे बढ़ाते आ रहे हैं.

खुद तैयार किये जाने वाले पारंपरिक रंग, ठाकुरबाड़ी से जुड़ी मान्यताएं, रक्षाबंधन से शुरू होने वाला भजन-कीर्तन और सभी समुदायों की भागीदारी इस आयोजन को एक अलग पहचान देती है.

अब आयोजक और ग्रामीण जन्माष्टमी की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. उम्मीद है कि इस बार भी सुगमा का मेला आस्था, परंपरा और भाईचारे का संदेश देगा.

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लेखक के बारे में

By दीपांकर श्रीवास्तव

दीपांकर श्रीवास्तव प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के सहरसा कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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