Saharsa Fertilizer Retailers Protest: बिहार के सहरसा जिले में इन दिनों खेती-किसानी के मौसम के बीच एक अनोखा और गंभीर संकट खड़ा हो गया है. जिला कृषि पदाधिकारी के कार्यालय के बाहर सोमवार को जब दर्जनों खाद विक्रेता नारेबाज़ी करते हुए पहुंचे, तो प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया. आमतौर पर खाद की किल्लत या ऊंचे दामों को लेकर किसानों का गुस्सा देखने को मिलता है, लेकिन इस बार कहानी का दूसरा पहलू सामने आया है. यहां खुदरा खाद दुकानदार ही सरकारी सिस्टम और थोक विक्रेताओं के खेल से परेशान होकर सड़क पर उतर आए हैं. दुकानदारों का साफ कहना है कि जब वे खुद ही थोक मंडी से महंगा खाद खरीदने को मजबूर हैं, तो आखिर सरकारी दर पर किसानों को खाद कैसे बेचें. इस दोहरे दबाव में हर दिन दुकानों पर कहासुनी और मारपीट तक की नौबत आ रही है.
सरकारी रेट और थोक भाव का वो अंतर, जिसने बिगाड़ा पूरा खेल
इस विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण खरीद मूल्य और सरकारी बिक्री मूल्य के बीच का भारी अंतर है. खुदरा विक्रेताओं ने मीडिया और अधिकारियों के सामने आंकड़ों का वो सच रखा जो हैरान करने वाला है. सरकार की ओर से यूरिया की कीमत 246 रुपये प्रति बैग तय की गई है, जबकि थोक विक्रेता खुदरा दुकानदारों को यही यूरिया करीब 350 रुपये प्रति बैग की दर से दे रहे हैं. ठीक इसी तरह डीएपी (DAP) की सरकारी निर्धारित कीमत 1350 रुपये प्रति बैग है, लेकिन थोक मंडी से खुदरा विक्रेताओं को यह करीब 1800 रुपये में मिल रही है. जब खरीद की लागत ही सरकारी बिक्री मूल्य से 100 से 450 रुपये अधिक होगी, तो कोई भी दुकानदार सरकारी दर पर सामान कैसे बेच सकता है.
किसानों का दबाव और दुकानदारों का दर्द: हर दिन मारपीट की नौबत
इस आर्थिक गणित का सीधा असर इंसानियत और सामाजिक रिश्तों पर पड़ रहा है. एक तरफ वो किसान हैं जो हाड़-तोड़ मेहनत करके फसल उगाते हैं और सरकारी मूल्य पर खाद पाना उनका अधिकार है. किसान जब दुकान पर पहुंचते हैं तो वे 246 रुपये में यूरिया और 1350 रुपये में डीएपी की मांग करते हैं. जब खुदरा दुकानदार अपनी लाचारी जताते हैं या ऊंची कीमत मांगते हैं, तो किसानों को लगता है कि दुकानदार मुनाफाखोरी कर रहा है. नतीजतन रोजाना दुकानों पर तीखी बहस, गाली-गलौज और कई बार तो मारपीट की स्थिति बन जाती है. खुदरा दुकानदार इस वक्त किसानों के गुस्से और थोक विक्रेताओं के शोषण के बीच पिस रहे हैं.
प्रशासनिक नाकामी और राजनीति का प्रवेश: सीपीआई ने साधा सरकार पर निशाना
खाद विक्रेताओं के इस आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राष्ट्रीय परिषद सदस्य ओमप्रकाश नारायण ने प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर दुकानदारों की मांगों का खुला समर्थन किया. उन्होंने कहा कि खुदरा विक्रेताओं की इस परेशानी का सीधा और घातक असर जिले के गरीब किसानों पर पड़ रहा है. उन्होंने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि प्रखंड से लेकर पंचायत और राज्य स्तर तक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं. जब अन्नदाता किसान को उसकी जरूरत का खाद निर्धारित कीमत पर नहीं मिल पा रहा है, तो यह सरकार की प्रशासनिक नाकामी और किसानों के साथ बड़ा अन्याय है.
Saharsa Fertilizer Retailers Protest: कृषि विभाग से जांच की मांग और आगे की राह
प्रदर्शन कर रहे खुदरा विक्रेताओं ने जिला कृषि पदाधिकारी और जिला प्रशासन से थोक विक्रेताओं की मनमानी की तुरंत जांच कराने की मांग की है. दुकानदारों का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन को थोक स्तर पर ही तय सरकारी दर पर उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. जब तक थोक मंडी में ओवरप्राइजिंग पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक निचले स्तर पर यह संकट खत्म नहीं हो सकता. दुकानदारों ने चेतावनी दी है कि यदि खरीद और बिक्री मूल्य का यह अंतर जल्द दूर नहीं किया गया, तो किसानों और विक्रेताओं के बीच का यह टकराव और विकराल रूप ले सकता है.
