सहरसा स्टेशन पर भटके बच्चों की आस बने रौशन माधव, छपरा की महिला को भिजवाया घर

सहरसा रेलवे स्टेशन पर दो दिनों से भटक रही एक बेबस माँ और उसके तीन भूखे बच्चों को समाजसेवी रौशन माधव ने सहारा दिया. उन्होंने न केवल बच्चों का पेट भरा, बल्कि महिला को टिकट खरीदकर सुरक्षित घर भी भिजवाया.

Raushan Madhav Saharsa Social Worker: जब अपनों की भीड़ में इंसान अकेला पड़ जाता है और जेब में एक रुपया भी नहीं बचता, तब इंसानियत का कोई न कोई नया रूप सामने आता है. कुछ ऐसा ही नजारा सहरसा रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला, जहां छपरा की रहने वाली एक बेबस मां अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ पिछले दो दिनों से भटक रही थी. बच्चों की भूख से तड़पती आंखें और मां की लाचारी को देखकर स्टेशन के रिक्शा चालकों का दिल पसीज गया. उन्होंने तुरंत एक ऐसे युवा को याद किया जो हर जरूरतमंद के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आता है. यह कहानी है सिमरी बख्तियापुर के बघवा गांव निवासी युवा समाजसेवी रौशन माधव की, जिन्होंने न केवल उन मासूमों की भूख मिटाई बल्कि उन्हें सही-सलामत उनके घर भी भिजवाया.

सहरसा जंक्शन पर बेबस मां और मासूमों की दर्दभरी दास्तान

सहरसा रेलवे स्टेशन पर रोजाना हजारों यात्री आते और जाते हैं, लेकिन दो दिनों से वहां एक अजीब सी खामोशी और लाचारी देखने को मिल रही थी. छपरा जिले की रहने वाली एक महिला अपने तीन छोटे बच्चों, जिनमें दो बेटियां और एक बेटा शामिल था, के साथ स्टेशन के कोने में बैठी हुई थी. महिला के पास न तो खाने के पैसे थे और न ही अपने घर लौटने का किराया. दो दिनों से भूखे-प्यासे बच्चे बार-बार मां का आंचल पकड़कर बिलख रहे थे, लेकिन लाचार मां के पास उन्हें देने के लिए सिर्फ आंसू ही थे.

रिक्शा चालकों की पहल और रौशन माधव का फरिश्ता बनकर पहुंचना

जब काफी देर तक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और बच्चों की हालत बिगड़ने लगी, तो स्थानीय रिक्शा चालकों ने संवेदनशीलता दिखाई. उन्हें मालूम था कि इस तरह की मुश्किल घड़ी में सहरसा का एक ही युवा है जो बिना किसी स्वार्थ के मदद के लिए दौड़ पड़ता है. उन्होंने तुरंत समाजसेवी रौशन माधव से संपर्क किया और स्टेशन की पूरी स्थिति बताई. सूचना मिलते ही रौशन माधव बिना एक पल गंवाए रेलवे स्टेशन पहुंचे. उन्होंने सबसे पहले रोते-बिलखते बच्चों के लिए भरपेट भोजन और पानी का प्रबंध किया. भोजन मिलते ही बच्चों के चेहरे पर जो मुस्कान आई, उसने वहां मौजूद हर इंसान का दिल छू लिया.

टिकट कटवाकर भिजवाया घर, आर्थिक मदद भी दी

केवल खाना खिलाना ही रौशन माधव का मकसद नहीं था. उन्होंने महिला से पूरी बात समझी और यह जाना कि वह किस तरह इस मुसीबत में फंसी थी. इसके बाद रौशन ने महिला और उसके तीनों बच्चों के लिए छपरा जाने का ट्रेन टिकट खुद अपने पैसों से कटवाया. इतना ही नहीं, यात्रा के दौरान और घर पहुंचने तक किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए उन्होंने महिला को नकद आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई. जब महिला अपने बच्चों के साथ ट्रेन में बैठी, तो उसकी आंखों से निकले खुशी के आंसू रौशन माधव की इस निस्वार्थ सेवा की गवाही दे रहे थे.

रोटी बैंक से लेकर रक्तदान तक, सहरसा और बघवा का बढ़ा रहे मान

रौशन माधव की पहचान अब सहरसा में एक ऐसे जनसेवक के रूप में बन चुकी है, जिन्हें संकट में फंसा कोई भी व्यक्ति बड़ी सहजता से याद कर लेता है. चाहे स्टेशन पर किसी यात्री का पर्स चोरी हो गया हो, किसी मरीज को अचानक खून की जरूरत पड़ जाए, या फिर किसी असहाय के पास दवा के पैसे न हों, रौशन हमेशा मदद के लिए तत्पर रहते हैं. वे अपनी समर्पित टीम 'रोटी बैंक' के माध्यम से रोजाना जरूरतमंदों और बेघरों को भोजन उपलब्ध कराते हैं. इसके साथ ही स्लम बस्तियों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए शिक्षा सामग्री, कपड़े बांटने और रक्तदान शिविर आयोजित करने में भी उनकी अहम भूमिका रहती है.

Raushan Madhav Saharsa Social Worker: संघर्षों से सीखा जीवन का असली मकसद, युवाओं के लिए बने मिसाल

अपनी इस निस्वार्थ सेवा भावना पर बात करते हुए रौशन माधव कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष को बहुत करीब से महसूस किया है. यही वजह है कि जब वे किसी लाचार या असहाय इंसान को देखते हैं, तो उनका दर्द अपना सा लगने लगता है. उनका कहना है कि आम लोगों और बेबसों की आवाज बनना ही उनके जीवन को असली सुकून देता है. उनका पूरा जीवन समाजसेवा और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित है. सिमरी बख्तियापुर के बघवा गांव के इस लाल की यह संवेदनशील पहल आज पूरे कोशी प्रमंडल के युवाओं के लिए सामाजिक जिम्मेदारी की एक नई मिसाल पेश कर रही है.

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By Vinay Kumar Mishra

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