पीएचडी प्रवेश में पैट खत्म करने पर उठे सवाल, छात्रों ने नेट के साथ परीक्षा बहाल करने की उठायी मांग

राज्य में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में हाल ही में किये गये नीतिगत बदलावों को लेकर शिक्षा जगत में नई बहस शुरू हो गयी है.

सहरसा. राज्य में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में हाल ही में किये गये नीतिगत बदलावों को लेकर शिक्षा जगत में नई बहस शुरू हो गयी है. यूजीसी के 28 मार्च 2024 के पत्र तथा बिहार राजभवन एवं विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्देशों के अनुसार राज्य के विश्वविद्यालयों में पीएचडी एडमिशन टेस्ट (पैट) को समाप्त कर यूजीसी नेट स्कोर को पीएचडी प्रवेश का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है. इस निर्णय के बाद विश्वविद्यालयों की स्वतंत्र प्रवेश परीक्षा प्रणाली लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है, जिस पर छात्रों एवं शिक्षाविदों ने चिंता जतायी है. इस विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए छात्र मुरारी कुमार मयंक ने कहा कि यह निर्णय भले ही राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण एवं एकरूपता स्थापित करने के उद्देश्य से लिया गया हो, लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण, आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के छात्रों पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि पहले पैट प्रणाली के तहत विश्वविद्यालय स्वयं विषय आधारित प्रवेश परीक्षा आयोजित करते थे, जिससे स्थानीय एवं ग्रामीण छात्रों को शोध कार्यक्रमों में प्रवेश का बेहतर अवसर मिलता था. वहीं वर्तमान में लागू हो रही नेट आधारित प्रणाली एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय परीक्षा है, जिसमें कोचिंग, आर्थिक संसाधनों एवं शहरी शैक्षणिक वातावरण की भूमिका अधिक रहती है. इससे अवसरों की समानता प्रभावित होने की आशंका है.

पेपर लीक ने छात्रों के बीच परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर पैदा की चिंता

मुरारी कुमार मयंक ने कहा कि हाल के वर्षों में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित कुछ राष्ट्रीय परीक्षाओं में पेपर लीक एवं अन्य अनियमितताओं को लेकर उठे सवालों ने छात्रों के बीच परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर भी चिंता पैदा की है. ऐसे में पीएचडी प्रवेश के लिए केवल एक केंद्रीकृत परीक्षा पर निर्भरता उचित नहीं मानी जा सकती. उन्होंने कहा कि यूजीसी के प्रावधानों के अनुसार नेट को पीएचडी प्रवेश के लिए एक पात्रता या आधार के रूप में अपनाया जा सकता है, लेकिन इसे एकमात्र अनिवार्य मार्ग बनाना आवश्यक नहीं है. विश्वविद्यालय स्तरीय पैट जैसी परीक्षाओं को पूरी तरह समाप्त करना शिक्षा में संतुलन, समान अवसर तथा विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है. उन्होंने मांग की कि पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में नेट के साथ-साथ विश्वविद्यालय स्तर की पैट परीक्षा को भी पुनः शामिल किया जाये, ताकि सामाजिक न्याय, समान अवसर एवं प्रतिभाशाली छात्रों के लिए शोध के द्वार खुले रह सकें.

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By Dipankar shriwastaw

दीपांकर श्रीवास्तव प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के सहरसा कार्यालय में काम कर रहे हैं. शिक्षा, अनुसंधान, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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