सहरसा. सुहाने मौसम और हल्की बूंदाबांदी के बीच सोमवार को जिले भर में वट सावित्री का पर्व पूरी आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया. सुबह से ही सुहागिन महिलाओं का झुंड शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित विशाल बरगद (वट) वृक्षों के पास पहुंचने लगा था. नए वस्त्रों में सजी-धजी महिलाओं ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपने-अपने पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की.
सोलह श्रृंगार कर महिलाओं ने की वट वृक्ष की परिक्रमा
इस पावन अवसर पर सुहागिन स्त्रियों ने 16 श्रृंगार कर वट वृक्ष की पूजा की. महिलाओं ने वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत (कलई) लपेटते हुए परिक्रमा की और पति की लंबी उम्र की प्रार्थना की. साथ ही, परिवार के सभी सदस्य निरोगी और ऐश्वर्यवान बने रहें, इसके लिए भी मन्नतें मांगी गईं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह पर्व सच्चे और पवित्र प्रेम का प्रतीक है. खासकर नवविवाहिताओं में इस पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा गया, जिन्होंने पारंपरिक तरीके से सज-धजकर अपनी पहली वट सावित्री पूजा की.
वट वृक्ष की लंबी आयु और धार्मिक महत्व
पंडित कामेश्वर झा ने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया:
- दीर्घायु का प्रतीक: वट (बरगद) वृक्ष की आयु काफी लंबी होती है. यही कारण है कि महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इस वृक्ष की पूजा करती हैं.
- नारी और प्रकृति का सम्मान: हिंदू धर्म की परंपराओं में प्रकृति की पूजा का विशेष स्थान रहा है. जिस घर में नारी का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है. इसी श्रद्धा के साथ नारी भी अपने पति को परमेश्वर मानकर उनके मंगल के लिए यह कठिन अनुष्ठान करती है.
पौराणिक कथा और पूजन की परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने इसी व्रत और अपने दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पा लिए थे. तभी से सुहागिन महिलाएं इस अखंड सौभाग्यवती होने के वरदान को पाने के लिए यह व्रत रखती हैं. इस पूजा के दौरान बांस से बने पंखे से वट वृक्ष और पति को हवा देने की परंपरा है. पूजा में मुख्य रूप से चना, मूंग, आम और लीची का प्रसाद चढ़ाया जाता है. पूजन के बाद सुहागिन महिलाओं (अहिबाती) को सुहाग की सामग्री जैसे तेल और सिंदूर उपहार स्वरूप देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है.
