सहरसा के सोनवर्षाराज से मुकेश कुमार सिंह की रिपोर्ट.
LPG Crisis : सहरसा में रसोई गैस की किल्लत और बढ़ती लागत का असर अब होटल कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है. गैस सिलेंडर की अनियमित उपलब्धता और बढ़ते खर्च के कारण कई छोटे-बड़े होटल संचालक लकड़ी और कोयले को वैकल्पिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं. होटल व्यवसायियों का कहना है कि यह उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी है. वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ इसे प्रदूषण बढ़ाने वाली स्थिति मान रहे हैं.
गैस की कमी ने बदला होटलों का किचन
स्थानीय होटल संचालक समीर कुमार बताते हैं कि पिछले कुछ समय से गैस की आपूर्ति नियमित नहीं हो पा रही है. कई बार समय पर सिलेंडर नहीं मिलने से रसोई संचालन प्रभावित होता है. ऐसे में होटलों को ग्राहकों की मांग पूरी करने के लिए लकड़ी और कोयले का सहारा लेना पड़ रहा है.
उनका कहना है कि गैस की तुलना में जलावन लकड़ी और कोयला अपेक्षाकृत सस्ते पड़ते हैं, जिससे संचालन लागत कम होती है और ग्राहकों को भी उचित कीमत पर भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है.
पुराने स्वाद की भी बढ़ी मांग
होटल संचालकों का मानना है कि पारंपरिक चूल्हों पर तैयार कुछ व्यंजनों का स्वाद ग्राहकों को अधिक पसंद आता है. यही कारण है कि कई ग्राहक ऐसे भोजन की विशेष मांग भी करते हैं.
हालांकि व्यवसायियों का कहना है कि आधुनिक सुविधाओं और बेहतर कार्यक्षमता के कारण वे गैस आधारित रसोई को ही प्राथमिकता देना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था अपनाने के लिए मजबूर कर रही हैं.
पर्यावरण पर बढ़ रही चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार लकड़ी और कोयले के अधिक उपयोग से वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है. इससे वातावरण में धुआं और हानिकारक कणों की मात्रा बढ़ सकती है, जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है.
पर्यावरणविदों का मानना है कि सरकार और संबंधित विभागों को गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए.
मजबूरी में अपनाना पड़ रहा विकल्प
क्षेत्र के होटल व्यवसायियों का कहना है कि यदि गैस पर्याप्त मात्रा में और उचित दर पर उपलब्ध हो जाए तो वे पर्यावरण अनुकूल ईंधन का ही उपयोग करना पसंद करेंगे. फिलहाल ग्राहकों को समय पर भोजन उपलब्ध कराने और कारोबार को सुचारु रूप से चलाने के लिए उन्हें लकड़ी और कोयले पर निर्भर रहना पड़ रहा है.
गैस संकट के बीच होटलों की रसोई में लौटे पारंपरिक चूल्हे अब स्थानीय कारोबार और पर्यावरण, दोनों के लिए चर्चा का विषय बन गए हैं.
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