सहरसा जिले का पतरघट प्रखंड और समूचा कोसी इलाका कभी अपनी समृद्ध जैव विविधता, पौष्टिक मोटे अनाजों और देशी फसलों की अनूठी महक के लिए विख्यात था. लेकिन अंधाधुंध रासायनिक खेती, हाइब्रिड बीजों के बढ़ते दखल और त्वरित मुनाफे के बाजारवाद ने कोसी की इस गौरवशाली विरासत को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है.
जिन खेतों में कभी मड़ुआ, खैरही, कौनी और जौ की बालियां लहलहाती थीं, वहां आज केवल हाइब्रिड मक्का और धान का एकाधिकार हो चुका है. इसका सीधा असर न सिर्फ मानव पोषण पर पड़ा है, बल्कि कोसी की मिट्टी, जलजीव और आकाश में उड़ने वाले परिंदे भी इस रासायनिक चक्र में दम तोड़ रहे हैं.
पोषण का खजाना थीं कोसी की ये पारंपरिक फसलें
एक दौर था जब कोसी का किसान मौसम और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर खेती करता था:
- गायब होते मोटे अनाज: खेतों से खैरही, कौनी, जौ, बाजरा, तीसी, कुरथी, मडुआ, तुलबुली, देशी मकई और देशी अरहर जैसी फसलें लगभग विलुप्त हो चुकी हैं.
- धान की सुगंधित प्रजातियां खत्म: देशरिया, रानी शुक्ला, पैरवा, पैख और चननचूर जैसी धान की देशी प्रजातियां अब दुर्लभ हो चुकी हैं.
- औषधीय व पोषक गुण: इन अनाजों में कैल्शियम, आयरन, फाइबर, फास्फोरस और प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती थी, जो मधुमेह, एनीमिया, हृदय रोग और पथरी जैसी गंभीर जीवनशैली जनित बीमारियों से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते थे.
रासायनिक खादों से उजड़ा परिंदों और देशी मछलियों का संसार
एकल फसल प्रणाली (Monoculture) और जहरीले कीटनाशकों ने प्रकृति के संतुलन को तहस-नहस कर दिया है:
- गायब हुए आसमान के पहरेदार: खेतों में प्रचुर मात्रा में दिखने वाली चींटियां, तितलियां, गौरैया, कौवे, चील और गिद्ध अब दुर्लभ हो गए हैं.
- नदी-नालों से जलजीव लापता: कीटनाशकों के पानी में घुलने से कोसी नदी और उसकी धाराओं में मिलने वाली 'पोठिया' सहित कई स्थानीय देशी मछलियां लुप्त होने के कगार पर हैं.
बहुफसलीय खेती से सुरक्षित था किसान का भविष्य
स्थानीय बुजुर्गों और प्रगतिशील किसानों का दर्द:
- कम लागत में पूरी खुराक: पहले किसान एक ही खेत में अनाज, दाल, तिलहन और हरी सब्जियां उगा लेते थे. इससे परिवार की खाद्य जरूरतें गांव में ही पूरी होती थीं और मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्राकृतिक रूप से बनी रहती थी.
- मौसम की मार का जोखिम: आज किसान हाइब्रिड बीजों और एक-दो फसलों पर निर्भर हैं. ऐसे में बाढ़ या सूखे की स्थिति में किसानों को भारी आर्थिक तबाही झेलनी पड़ती है.
जलवायु संकट के दौर में उम्मीद की किरण हैं मोटे अनाज
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित बारिश के दौर में पारंपरिक मोटे अनाज सबसे सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प हैं:
- ये फसलें बेहद कम पानी और कम लागत में बंपर उत्पादन देने में सक्षम हैं तथा बाढ़-सूखे के झटके सह सकती हैं.
- स्थानीय किसानों ने मांग की है कि कृषि विभाग कोसी क्षेत्र में देशी बीज बैंक की स्थापना करे, किसानों को पारंपरिक खेती के लिए विशेष आर्थिक प्रोत्साहन दे और इन उत्पादों के लिए मजबूत बाजार व प्रोसेसिंग यूनिट्स तैयार करे.
यदि समय रहते इस दिशा में ठोस पहल नहीं हुई, तो कोसी की यह अनूठी जैव विविधता केवल किताबों और लोकगीतों के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी.
