बदहाल पड़े बाढ़ आश्रय स्थल: कहीं दबंगों का अतिक्रमण तो कहीं नशेड़ियों का बना अड्डा

सहरसा के पतरघट प्रखंड में करोड़ों की लागत से बने बाढ़ आश्रय स्थल सह पशुशरण स्थली प्रशासनिक उपेक्षा के कारण खंडहर बन रहे हैं. संपर्क सड़क न होने से जहां ये आपदा में बेकार साबित हो रहे हैं, वहीं अब इन पर अतिक्रमण और नशेड़ियों का कब्जा है.

पतरघट (सहरसा) से राजेश कुमार सिंह की रिपोर्ट: बाढ़ एवं विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आम लोगों और मवेशियों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के उद्देश्य से क्षेत्र के विभिन्न पंचायतों में करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए ‘बाढ़ आश्रय स्थल सह पशुशरण स्थली’ आज खुद बदहाली की मार झेल रहे हैं. विभागीय देखरेख और रखरखाव के अभाव, प्रशासनिक उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता के कारण अधिकांश बहुमंजिला भवन अब खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं.

पिच की छत टूट रही, खिड़की-चौखट ले उड़े चोर

वर्तमान स्थिति यह है कि देखरेख न होने से कई भवनों की छत के छज्जे टूटकर गिर रहे हैं. कमरों की खिड़कियां और लोहे-लकड़ी के चौखट तक गायब हो चुके हैं. कुछ जगहों पर स्थानीय दबंगों ने भवनों पर अवैध कब्जा जमा रखा है, तो कहीं किसानों द्वारा इसमें पशुओं का भूसा और चारा रखा जा रहा है.

शाम ढलते ही जमतें हैं असामाजिक तत्व

चूंकि ये भवन आबादी से थोड़ी दूरी पर सुनसान इलाकों में बने हैं, इसलिए शाम ढलते ही यहां असामाजिक तत्वों की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कई भवन अपराधियों और स्मैकियों (नशेड़ियों) का सुरक्षित ठिकाना बन चुके हैं. भवन परिसर और कमरों के भीतर शराब की खाली बोतलें, प्रतिबंधित कोरेक्स सिरप की शीशियां एवं अन्य नशीले पदार्थों के अवशेष आम तौर पर बिखरे पड़े मिलते हैं.

इन जगहों पर बदहाली की सबसे खराब स्थिति

प्रारंभिक पड़ताल और ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार प्रखंड के इन क्षेत्रों में स्थिति बदतर है:

  • पस्तपार पंचायत: सखुआ स्थित आश्रय स्थल.
  • धबौली पश्चिम पंचायत: कहरा टेमा टोला स्थित भवन.
  • अन्य प्रभावित क्षेत्र: पामा और भद्दी सहित कई अन्य जगहों पर बने पशुशरण स्थली की हालत बेहद खराब पायी गयी है.

करोड़ों का भवन बेकार, एप्रोच रोड ही नहीं बनी

ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप है कि विभागीय स्तर पर ऊंचे-ऊंचे भवन तो खड़े कर दिए गए, लेकिन उन भवनों तक पहुंचने के लिए एप्रोच रोड (संपर्क सड़क) का निर्माण नहीं कराया गया. बारिश और बाढ़ के मौसम में इन भवनों के चारों ओर पानी भर जाता है. सड़क नहीं रहने के कारण आपदा के समय मवेशियों या मरीजों को लेकर वहां तक पहुंचना असंभव हो जाता है. ऐसे में करोड़ों की सरकारी राशि से बनी ये इमारतें जनता के लिए हाथी का दांत साबित हो रही हैं.

चापाकल उखड़े, कमरों में बांधे जा रहे मवेशी

भवन परिसरों में बड़े-बड़े जंगली पेड़-पौधे और झाड़ियां उग आई हैं. कई कमरों के ताले तोड़कर असामाजिक तत्वों द्वारा अंदर गंदगी और मल-मूत्र त्याग किया जा रहा है. कहीं मक्के का ठठेरा (पुंज) रखा गया है तो कहीं दीवारों पर गोबर के उपले (गोइठा) ठोके जा रहे हैं. संवेदक (ठेकेदार) द्वारा लगाए गए चापाकल तक उखाड़ लिए गए हैं और शौचालय के गेट पूरी तरह टूट चुके हैं.

अधिकारियों का पल्ला झाड़ू रवैया

स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद संवेदकों को भवन की चाबी विभागीय नियमानुसार अंचलाधिकारी (सीओ) को सौंपनी चाहिए थी, ताकि इसका इस्तेमाल हो सके, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. इस संबंध में पूछे जाने पर प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (BPRO) ने अपना पल्ला झाड़ते हुए बताया कि बाढ़ आश्रय स्थल सह पशुशरण स्थली का मामला सीधे आपदा प्रबंधन विभाग से जुड़ा है, इसलिए इस पर एडीएम (अपर समाहर्ता) स्तर से ही कोई आधिकारिक जानकारी दी जा सकती है.

इधर, इलाके के जागरूक ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और जिलाधिकारी से सभी बाढ़ आश्रय स्थलों का अविलंब जीर्णोद्धार कराने, संपर्क सड़क का निर्माण करने तथा भवनों को अतिक्रमण मुक्त कराने की पुरजोर मांग की है.

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Published by: Divyanshu Prashant

Divyanshu Prashant is a contributor at Prabhat Khabar.

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