निजी विद्यालयों के निर्धारित दुकानों से खरीदारी के लिए बाध्य करने पर डीएम ने लगायी रोक

निजी विद्यालयों के निर्धारित दुकानों से खरीदारी के लिए बाध्य करने पर डीएम ने लगायी रोक

अनिवार्य पुस्तकों व यूनिफॉर्म का विवरण 10 फरवरी के पूर्व विद्यालय की वेबसाइट पर करें अपलोड उल्लंघन किये जाने पर संबंधित के विरुद्ध होगी कार्रवाई सहरसा . जिलाधिकारी सह जिला दण्डाधिकारी दीपेश कुमार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-163 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते निजी विद्यालयों द्वारा बच्चों एवं उनके अभिभावकों पर निर्धारित दुकानों से खरीददारी के लिए बाध्य करने को लेकर निर्देश जारी किया है. उन्होंने कहा कि कोई भी विद्यालय संचालक व प्राचार्य विद्यार्थियों को विद्यालय की यूनिफार्म, जूते, टाई, पाठ्य पुस्तकें, कापियां या अन्य स्टेशनरी सामग्री किसी एक खास दुकान या विक्रेता से क्रय करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे. सभी निजी विद्यालयों के संचालक अपने विद्यालय में संचालित प्रत्येक कक्षा के लिए अनिवार्य पुस्तकों की सूची एवं यूनिफॉर्म का विवरण 10 फरवरी के पूर्व विद्यालय की वेबसाइट पर अपलोड व विद्यालय परिसर के किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शित करना सुनिश्चित करेंगे. विद्यालय प्रशासन यूनिफॉर्म में कम से कम तीन वर्षों तक कोई परिवर्तन नहीं करेंगे. इस आदेश का उल्लंघन किये जाने पर संबंधित व्यक्ति, संस्था, आयोजक के विरूद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जायेगी. विद्यालय द्वारा आदेशों की अवेहलना की स्थिति में विद्यालय के प्राचार्य, संचालक, प्रबंधक एवं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के समस्त सदस्य उत्तरदायी माने जायेंगे. यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है, जो अगले 30 जून तक प्रभावी रहेगा. उन्होंने कहा कि मितव्ययी, गुणवत्तापूर्ण एवं सर्व सुलभ शिक्षा व्यवस्था का निर्माण लोक कल्याणकारी प्रशासन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्यों में से एक है. उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से मिल रही जानकारी के अनुसार जिले के निजी विद्यालयों द्वारा अभिभावकों से शुल्क के साथ अन्य सामग्री की भी अधिक कीमत वसूली की जा रही है. इन निजी विद्यालयों के संचालकों द्वारा पुस्तकें, यूनिफॉर्म, बैग, जूते, कॉपियां अत्यधिक महंगी कीमत पर बेची जा रही है एवं अभिभावकों को केवल निर्धारित दुकानों से ही सामान खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है. जिससे उन्हें खुले बाजार से सस्ती चीजें खरीदने की स्वतंत्रता नहीं मिल पाती है. इस एकाधिकारी प्रवृति के कारण विशेष रूप से गरीब वर्ग के पालकों पर अनुचित एवं भारी आर्थिक खर्च का बोझ पड़ रहा है. इस तथ्य से भी अवगत कराया गया है कि निजी विद्यालय एवं स्टेशनरी, यूनिफॉर्म विक्रेता, पुस्तकों का अत्यधिक मूल्य पर तय करते हैं. जिससे यह स्थिति पूर्णतया शोषणकारी बन गयी है. एकाधिकार खत्म करने एवं विभिन्न माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं से मुझे समाधान हो गया है कि जिले में इस एकाधिकारी प्रवृति से समाज में असंतोष एवं अशांति का कारण बन सकती है. इसका निवारण अत्यंत आवश्यक है. यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस प्रवृति पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाये. जिससे जनहित, शांति व्यवस्था एवं विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके.

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By Dipankar Shriwastaw

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