लोगों के एक-दूसरे को गुलाल लगाकर मनायी बनगांव की घुमौर होली

सोमवार को मिथिलांचल का प्रसिद्ध बनगांव की घुमौर होली हर्षोल्लास के साथ शांतिपूर्ण तरीके से मनायी गयी. सुबह से ही लोग छोटी-छोटी टोली में रंगों में रंगे नजर आये.

बरसाने की तरह अलबेली है बनगांव की घुमौर होली

सभी जाति और धर्म के लोग शामिल होकर एक साथ मनाते हैं होली

1810 में शुरू हुई परंपरा आज भी है कायम

कहरा. सोमवार को मिथिलांचल का प्रसिद्ध बनगांव की घुमौर होली हर्षोल्लास के साथ शांतिपूर्ण तरीके से मनायी गयी. सुबह से ही लोग छोटी-छोटी टोली में रंगों में रंगे नजर आये. इस दौरान रास्ते में जो भी ग्रामीण या बाहर के लोग नजर आये, सभी को विभिन्न रंगों में रंगीन कर होली मनायी. दिन चढ़ते ही छोटी-छोटी रंगों की टोली एक बड़ी टोली में बदल गयी. जिसमें स्थानीय सहित बाहर से भी होली खेलने आये हजारों की संख्या में लोग पारंपरिक तरीके के तहत गांव के मध्य भगवती स्थान पहुंचे. जहां एक साथ मिल कर एक दूसरे को रंगों से सराबोर कर होली का जश्न मनाया. जिसे देखने के लिए अन्य गांवों के लोग पहुंचे थे. जिसके कारण भगवती मंदिर प्रांगण छोटा पड़ गया था और वहां होली का विहंगम दृश्य उत्पन्न हो गया.

200 साल पुराना है इतिहास

बनगांव की घुमौर होली का इतिहास 200 साल पुराना है. संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं द्वारा 1810 में शुरू की गयी होली की यह परंपरा आज भी कायम है और शताब्दी वर्षों के बाद आज भी सांप्रदायिक एकता का प्रतीक है. यहां होली में सभी जाति और धर्म के लोग शामिल होकर एक साथ इस पर्व को मनाते हैं. होली को लेकर वर्षों पूर्व बनायी गयी परंपरा को कायम रखते हुए देश और विदेश को आपसी भाइचारे का संदेश देते हैं. जाति धर्म का भेदभाव भूलकर होली के दिन लोग गांव के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग टोली बनाकर मदमस्त हो होली है का उदघोष करते एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर होली खेलते हैं. गांव के डिहली बंगला, बंगला गाछी, ललित झा बंगला, मयूरी खां आड़, मनसाराम खां दरवाजा, विषहरी स्थान, खोखा बाबू चौक सहित अन्य चिह्नित स्थल पर इकट्ठा होकर सभी मिलकर होली खेलते हैं. सभी बंगले पर पानी और रंग की फुहार बहती रहती है. लोग एक-दूसरे से गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं.

तीसरे पहर भगवती स्थान में जुटते हैं लोग

गांव में सभी बंगले पर होली खेलने के बाद तीसरे पहर में हजारों लोग भगवती स्थान परिसर पहुंचते हैं. जहां एक दूसरे के कंधे पर चढ़ एक दूसरे से गले मिल होली खेलते हैं. सैकड़ों की संख्या में एक दूसरे के कंधे पर चढ़ होली खेलने का यह नजारा बहुत ही अद्भुत दिखता है. भगवती मंदिर के ऊपर लगे फव्वारे से पानी की बारिश होती रहती है और नीचे हजारों की संख्या में लोग गोल-गोल घूमते रहते हैं. इसी कारण इसे घुमौर होली कहा जाता है. बनगांव में हिंदू, मुस्लिम सहित सभी जाति के लोग सभी बैर-भाव भुला एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर होली खेलते हैं. ऊंच-नीच, छूत-अछूत कोई भी भेद होली में यहां नहीं दिखता है. होली खेल रहे लोग बाबाजी कुटी जाकर संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं सहित अन्य देवताओं को प्रणाम कर इसका समापन करते हैं.

एक दिन पूर्व ही खेली जाती है होली

सामान्य रूप से फाल्गुन पूर्णिमा को सम्मत जलाने और चैत्र प्रतिपदा को होली खेलने की परंपरा है, लेकिन बनगांव में एक दिन पूर्व यानी पूर्णिमा के दिन ही होली खेली जाती है. होली खेलने के बाद शास्त्र में दिए गए समय के अनुसार ही सम्मत जलाया जाता है. इस बार शहर में चार मार्च को होली मनायी जायेगी, जबकि बनगांव में यह त्योहार दो मार्च को ही मनाया जायेगा. बनगांव के होली के महत्व को देखते हुए बिहार सरकार का कला संस्कृति विभाग यहां तीन दिवसीय होली महोत्सव का आयोजन करता है. इस बार भी तीनों दिन अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे. मुख्य आकर्षण लोक गायिका देवी की गायिकी होगी.

संत लक्ष्मी नाथ गोस्वामी से प्रेरित बनगांव की होली एकता और समरसता की मिसाल

18वीं सदी में स्थानीय लोकदेवता संत लक्ष्मी नाथ गोस्वामी ने बनगांव की होली को सामाजिक समरसता का माहौल देते एक अलग दिशा दी थी. जिससे समाज के सभी वर्गों की भागीदारी बना एक साथ होली मनायी जा सके. जिसके कारण क्षेत्र के अन्य धर्मों के लोग भी बनगांव होली में अपनी हिस्सेदारी दे होली मनाने लगे. जो सामाजिक एकता की मिसाल बनती चली गयी. जिसके कारण बनगांव की होली की प्रसिद्धि धीरे-धीरे पूरे मिथिलांचल सहित देश स्तर पर पहुंच गया. आज भी ग्रामीण होली की शुरुआत संत लक्ष्मी नाथ गोस्वामी के ही नाम से कर समापन भी उन्हीं के नाम के साथ करते हैं. राम-रहीम और मोहन-मुस्ताक खेले होली का भी नारा बनगांव होली से ही शुरु हुआ था. लोकदेवता संत लक्ष्मी नाथ के आदर्श पर बने सामाजिक समरसता की पहचान बनी बनगांव की होली में सभी धर्म एवं संप्रदाय के लोगों के भाग लेने से क्षेत्र सहित बनगांव होली में राम-रहीम और मोहन-मुस्ताक खेले होली का भी बनगांव होली में नारा लगना शुरू हुआ था, जो आज भी कायम है.

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By Dipankar Shriwastaw

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