"नदी का पानी लाल हो गया था…", 45 साल बाद भी नहीं भूले देवन सिंह उस भयावह दिन को

Bagmati Rail Tragedy: "चारों तरफ चीख-पुकार मची थी. लोग अपनों को खोज रहे थे. नदी का पानी लाल दिखाई दे रहा था..." यह शब्द हैं उस शख्स के, जिसने 6 जून 1981 के बागमती रेल हादसे को अपनी आंखों से देखा था. 45 साल बाद भी उस दिन का दर्द और भय उनके जेहन में जिंदा है.

सिमरी बख्तियारपुर (सहरसा) आयुष गुप्ता की रिपोर्ट.

Bagmati Rail Tragedy: 6 जून 1981 को बागमती नदी में हुई भीषण रेल दुर्घटना भारतीय रेल इतिहास के सबसे दर्दनाक हादसों में गिनी जाती है. हादसे के 45 वर्ष बाद भी उस दिन की भयावह तस्वीरें प्रत्यक्षदर्शियों की यादों में ताजा हैं. उस समय फनगो पंचायत के उपसरपंच रहे और वर्तमान में बुच्चा पंचायत के सरपंच देवन सिंह आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं.

हादसे की खबर मिलते ही घोड़े पर पहुंचे घटनास्थल

देवन सिंह बताते हैं कि जैसे ही रेल दुर्घटना की सूचना मिली, वह घोड़े पर सवार होकर बागमती नदी की ओर निकल पड़े. जब वे घटनास्थल पर पहुंचे तो वहां का दृश्य किसी भयावह सपने से कम नहीं था.

उनके अनुसार नदी के आसपास हजारों लोग जमा थे. चारों तरफ अफरा-तफरी और चीख-पुकार का माहौल था. ट्रेन की कुछ बोगियां पुल के पास लटकी हुई थीं, जबकि अधिकांश डिब्बे नदी में समा चुके थे.

“नदी का पानी लाल दिख रहा था”

देवन सिंह उस दृश्य को याद करते हुए कहते हैं कि बागमती नदी का पानी लाल दिखाई दे रहा था. घायल यात्री जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. कई लोग तैरकर किसी तरह नदी से बाहर निकल आए थे, जबकि अनेक लोग गंभीर रूप से घायल अवस्था में मदद की गुहार लगा रहे थे.

उन्होंने बताया कि उस दौर में संसाधन सीमित थे, लेकिन आसपास के गांवों के लोगों ने मानवता का परिचय देते हुए राहत और बचाव कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

सेना भी उतरी थी राहत कार्य में

हादसे की गंभीरता को देखते हुए सेना के जवान भी घटनास्थल पर पहुंचे थे. सेना और बचाव दलों ने कई दिनों तक नदी में उतरकर शवों और लापता लोगों की तलाश की.

देवन सिंह के मुताबिक केवल फनगो पंचायत क्षेत्र में ही करीब 60 लोगों की मौत हुई थी. वहीं धनछड़ गांव के लगभग नौ लोगों ने इस दुर्घटना में अपनी जान गंवाई थी. हादसे के बाद पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई थी.

45 साल बाद भी जिंदा है दर्द

देवन सिंह कहते हैं कि बागमती रेल हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के इतिहास का ऐसा जख्म है जो आज भी नहीं भरा है. अपनों की तलाश में भटकते लोग, बिखरा सामान, रोते-बिलखते परिजन और मदद की गुहार लगाते घायल आज भी उनकी आंखों के सामने घूम जाते हैं.

45 साल बाद भी बागमती रेल हादसे की यादें कोसी और सीमांचल के लोगों के दिलों में एक दर्दनाक अध्याय की तरह दर्ज हैं, जिन्हें समय भी मिटा नहीं सका है.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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