सहरसा के महिषी स्थित 'बाबा कारू खिरहर' धाम में उमड़ती है आस्था; पशुधन की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए होता है दुग्धाभिषेक

सहरसा के महिषी स्थित बाबा कारू खिरहर स्थान, लोकआस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां भक्त पशुधन की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए मन्नतें मांगते हैं और दुग्धाभिषेक करते हैं.

सहरसा जिले के महिषी प्रखंड स्थित प्रसिद्ध 'बाबा कारू खिरहर स्थान' संपूर्ण कोसी क्षेत्र सहित बिहारभर में लोकआस्था, अगाध श्रद्धा और ग्रामीण धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है. प्रतिदिन दूर-दराज के इलाकों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर बाबा कारू खिरहर की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि तथा पशुधन की रक्षा की प्रार्थना करते हैं. लोकमान्यता है कि बाबा के दरबार में सच्चे मन से जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है, जिसके बाद भक्त यहां आकर बाबा का पारंपरिक दुग्धाभिषेक करते हैं.

किसानों और पशुधन के रक्षक देवता के रूप में है मान्यता

महिषी स्थित यह पावन धाम अपनी प्राचीन लोकपरंपरा और ग्रामीण सांस्कृतिक धरोहर के लिए विख्यात है:

  • पशुपालकों के संरक्षक: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा कारू खिरहर को किसानों और मवेशियों (पशुधन) के रक्षक देव के रूप में पूजा जाता है. ग्रामीण अपने मवेशियों के उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए नियमित रूप से यहां मन्नत मांगते हैं.
  • दुग्धाभिषेक की परंपरा: मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु यहां विशेष रूप से ताजा दूध, फूल और नैवेद्य अर्पित करते हैं.
  • सुबह-शाम भव्य आरती: मंदिर में सुबह और संध्या काल में होने वाली विशेष आरती के दौरान शंखध्वनि और घंटानाद से पूरा परिसर दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठता है.

विशेष अवसरों और पर्व-त्योहारों पर उमड़ता है जनसैलाब

सामान्य दिनों के अलावा विशेष तिथियों पर यहां का नजारा बेहद भव्य और मनोहारी होता है:

  • भक्तिमय माहौल: धार्मिक अवसरों और लोकपर्वों पर तड़के सुबह से लेकर देर रात तक मंदिर में भजन-कीर्तन, विशेष अनुष्ठान और दर्शन-पूजन का अटूट सिलसिला चलता रहता है.
  • विकसित हो रहीं सुविधाएं: हाल के वर्षों में मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए साफ-सफाई, बैठने की व्यवस्था और रोशनी के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं, जिससे पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अद्भुत शांति का अहसास होता है.

धार्मिक आस्था और कोसी के लोक-पर्यटन का उभरता केंद्र

महिषी का यह स्थल अब केवल एक स्थानीय पूजा स्थल न रहकर एक प्रमुख पर्यटन व आध्यात्मिक केंद्र का रूप ले चुका है:

  • अटूट विश्वास: स्थानीय लोगों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि बाबा कारू खिरहर के दरबार में आया कोई भी याचक कभी खाली हाथ वापस नहीं लौटता.
  • ग्रामीण संस्कृति की पहचान: यह मंदिर कोसी की लोकसंस्कृति, आपसी सौहार्द और प्रकृति व पशु-प्रेम के अनूठे मेल का प्रतीक बना हुआ है.


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By Vinay Kumar Mishra

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