Aran Mayur Abhyaranya: सत्तर कटैया सहरसा में खेत-खलिहान हों या गांव की गलियां, जंगल का इलाका हो या किसी ग्रामीण का दरवाजा. आरण गांव में मोर कहीं भी नजर आ सकते हैं. दावा है कि इस गांव में 500 से अधिक मोर रहते हैं. राष्ट्रीय पक्षी के लिए प्राकृतिक आश्रय बने इस गांव में अब मयूर अभयारण्य बनाने की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है.
जदयू प्रदेश सलाहकार समिति के सदस्य किशोर कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर विशनपुर पंचायत के आरण गांव में मयूर अभयारण्य बनाने की मांग की है. उनका कहना है कि गांव वर्षों से मोरों का प्राकृतिक आश्रय स्थल रहा है, लेकिन सुरक्षा और संरक्षण की स्थायी व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है.
दिलचस्प बात यह है कि इस मांग की कहानी नयी नहीं है. करीब एक दशक पहले भी सरकारी स्तर पर आरण गांव में मोरों के संरक्षण और अभयारण्य की पहल हुई थी.
तीन दिन तक कैमरे में कैद हुई थीं मोरों की गतिविधियां
किशोर कुमार सिंह के अनुसार, वर्ष 2016 में राज्य सरकार के निर्देश पर भागलपुर से मंदार नेचर क्लब की टीम और पूर्णिया वन प्रमंडल के अधिकारियों ने आरण गांव में लगातार तीन दिनों तक मोरों की गतिविधियों की वीडियोग्राफी की थी.
मोरों की गतिविधियों पर तैयार सामग्री के आधार पर पटना की साक्षी कम्युनिकेशन ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी तैयार की थी. यानी आरण में बड़ी संख्या में मोरों की मौजूदगी को लेकर सरकारी स्तर पर उस समय अध्ययन और दस्तावेजीकरण तक किया गया था.
इसके बाद यह मामला मुख्यमंत्री के स्तर तक भी पहुंचा.
16 दिसंबर 2016 को गांव पहुंचे थे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
किशोर कुमार सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी निश्चय यात्रा के दौरान 16 दिसंबर 2016 को मधेपुरा से सहरसा आने के क्रम में आरण गांव का दौरा किया था.
इस दौरान उन्होंने गांव में मौजूद मोरों को देखा था और डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी देखी थी. सिंह के अनुसार, उस समय मुख्यमंत्री ने सहरसा के तत्कालीन डीएम को आरण में मयूर अभयारण्य बनाने का प्रस्ताव तैयार कर भेजने का निर्देश दिया था.
इसके साथ ही वन विभाग को मोरों के ठहराव और सुरक्षा की व्यवस्था करने का निर्देश दिए जाने की बात भी कही गयी थी.
लेकिन करीब एक दशक गुजरने के बाद भी अभयारण्य का निर्माण नहीं हो सका.
'मोर ग्राम आरण' का बोर्ड भी लगाया गया था
आरण गांव में संरक्षण की दिशा में सरकारी पहल का एक और संकेत तब मिला था, जब वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से यहां 'मोर ग्राम आरण' का बोर्ड लगाया गया था.
ग्रामीणों को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए भी प्रेरित किया गया था. इसका उद्देश्य मोरों के प्राकृतिक आवास को बेहतर बनाना और उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना था.
हालांकि, इन पहलों के बावजूद गांव को औपचारिक मयूर अभयारण्य का दर्जा या ऐसी स्थायी संरक्षण व्यवस्था नहीं मिल सकी, जिसकी मांग वर्षों से की जा रही है.
खेत से दरवाजे तक घूमते हैं मोर
किशोर कुमार सिंह के अनुसार, वर्तमान में आरण गांव में 500 से अधिक मोर निवास करते हैं. ये मोर गांव के जंगल, खेत-खलिहान और आसपास के इलाकों में तो दिखाई देते ही हैं, लोगों के घर और दरवाजे तक भी पहुंच जाते हैं.
ग्रामीणों के लिए मोर अब गांव की पहचान का हिस्सा बन चुके हैं. राष्ट्रीय पक्षी होने के कारण ग्रामीण इनके प्रति स्नेह रखते हैं और इन्हें नुकसान पहुंचाने से बचते हैं.
हालांकि, मोरों की बड़ी संख्या के कारण ग्रामीणों को अपनी फसलों को लेकर भी परेशानी होती है.
फसल को नुकसान फिर भी ग्रामीण नहीं पहुंचाते मोरों को नुकसान
मोर खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. इसके बावजूद ग्रामीण राष्ट्रीय पक्षी के प्रति अपने लगाव के कारण उन्हें किसी तरह की क्षति नहीं पहुंचाते हैं.
यह आरण गांव और मोरों के बीच बने उस संबंध को दिखाता है, जिसमें एक तरफ किसानों की अपनी आर्थिक चिंता है और दूसरी तरफ राष्ट्रीय पक्षी के प्रति संरक्षण की भावना.
ऐसे में मयूर अभयारण्य बनने से न केवल मोरों को सुरक्षित प्राकृतिक आवास मिल सकता है, बल्कि ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच बेहतर संतुलन बनाने की व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है.
जंगली जानवरों से मोरों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता
जदयू नेता का कहना है कि गांव में मौजूद मोरों के सामने जंगली जानवरों से खतरा बना रहता है. कई बार जंगली जानवर मोरों को मारकर खा जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं.
यही वजह है कि उन्होंने अभयारण्य को केवल पर्यटन परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पक्षी के संरक्षण और सुरक्षा के लिए जरूरी कदम के तौर पर लेने की मांग की है.
उनका कहना है कि यदि मोरों के लिए सुरक्षित क्षेत्र, ठहरने की जगह और संरक्षण की पुख्ता व्यवस्था हो, तो आरण को एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक और पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकता है.
Aran Mayur Abhyaranya: 10 साल पुरानी पहल के बाद फिर क्यों उठी मांग?
आरण में मयूर अभयारण्य की मांग के पीछे सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2016 में सरकारी स्तर पर पहल और मुख्यमंत्री के निर्देश के बावजूद यह योजना आगे क्यों नहीं बढ़ सकी.
अब जदयू नेता ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र भेजकर वर्षों पुरानी मांग को फिर सामने रखा है. उन्होंने मुख्यमंत्री से आरण गांव में मयूर अभयारण्य बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और मोरों के रखरखाव तथा सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था कराने की मांग की है.
आरण के ग्रामीणों के लिए यह केवल अभयारण्य बनाने की मांग नहीं है. यह उस प्राकृतिक विरासत को बचाने की कोशिश भी है, जिसके कारण उनका गांव वर्षों से सैकड़ों मोरों का आश्रय बना हुआ है.
अब देखना होगा कि एक दशक पुरानी इस मांग पर सरकार क्या कदम उठाती है और आरण के मोरों को स्थायी संरक्षण कब मिलता है.
