नहीं है बर्न मरीजों के लिए विशेष वार्ड
मरीजों को रहना पड़ता है दूसरे मरीजों के साथ
आनन फानन में बनाये गये वार्ड का नहीं खुलता है ताला
सहरसा : कोसी का प्रमंडलीय सदर अस्पताल एक अदद बर्न वार्ड के लिए तरस रहा है. ऐसी बात नहीं है कि अस्पताल में बर्न वार्ड नहीं है. लेकिन बर्न वार्ड के सुसज्जित नहीं रहने के कारण झुलसे हुए मरीजों को व्यवस्था की कमी के कारण और दर्द मिलता है. जबकि सदर अस्पताल में सहरसा के अलावा सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया सहित आस पास के कई जिलों से लोग अपना इलाज कराने पहुंचते हैं. जब सदर अस्पताल में ही कोई व्यवस्था नहीं है तो पीएचसी की क्या स्थिति होगी. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. बावजूद इसके न जिला प्रशासन और न ही किसी जनप्रतिनिधि ने ही इस ओर कभी दिलचस्पी दिखायी.
जानकारी के अनुसार, प्रतिदिन सैकड़ों मरीजों का ओपीडी में एवं दर्जनों मरीजों का आपातकालीन वार्ड में इलाज होता है. सप्ताह में दो से तीन मरीज करंट, आत्महत्या के प्रयास व आगजनी में झुलस कर इलाज के लिए सदर अस्पताल आते हैं. इस ओर न ही जिला प्रशासन और न ही किसी जनप्रतिनिधि का ध्यान जा रहा है. जबकि सहरसा एम्स निर्माण के लिए मजबूत दावेदार है. ऐसे में प्रमंडलीय अस्पताल में बर्न वार्ड का नहीं होने से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को परेशानी हो रही है.
एमपी के निर्देश का भी नहीं हुआ असर
कुछ माह पूर्व सदर अस्पताल निरीक्षण के दौरान सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को बर्न वार्ड नहीं रहने की जानकारी मिलने पर उन्होंने सिविल सर्जन को अविलंब बर्न वार्ड बनाने का निर्देश दिया गया. जिसके बाद आनन फानन में ड्रेसिंग कक्ष के बगल में एक कमरे की साफ सफाई कर उसे बर्न वार्ड का रूप दिया गया. लेकिन आज तक एक भी मरीज को उसमें भरती कर इलाज नहीं किया गया है. कुछ दिन पूर्व जिलापदाधिकारी ने निरीक्षण के दौरान आपातकालीन वार्ड में बर्न मरीजों को देख फटकार लगायी तो उसे आनन फानन में नशा मुक्ति केंद्र के खाली बेड पर शिफ्ट कर इलाज करना शुरू किया गया. जिसके बाद स्थिति जस की तस है. बर्न मरीज पुन: दर्द सह रह रहे है. सांसद ने अस्पताल प्रशासन को वार्ड खोलने के बाद उसमें सांसद मद से एसी सहित अन्य उपकरण देने की बात कही थी. जिसके बाद ऑपरेशन थियेटर के पीछे एक भवन के एक कमरे की साफ सफाई व रंगाई पुताई कर उसमें बर्न वार्ड तो लिख दिया गया, लेकिन न ही उसमें मरीज को कभी भरती कर इलाज शुरू किया गया और न ही सांसद के तरफ से एसी सहित अन्य उपकरण दिया गया.
रोगियों को संक्रमण का खतरा
बर्न मरीज के भरती होने के बाद अस्पताल प्रशासन उसे दूसरे वार्डों में अन्य मरीजों के साथ भरती कर देते हैं. जिससे उस मरीज में संक्रमण फैलने की संभावना अधिक रहती है. जबकि बर्न मरीजों को संक्रमण से दूर रखना आवश्यक है. इसके अलावा वार्ड का साफ-सफाई भी मरीज के लिए जरूरी है. जबकि वर्तमान में महिला व पुरुष बर्न मरीजों को जिस वार्ड में रखा जाता है, उसके आसपास गंदगी का अंबार लगा रहता है. इसके अलावा आसपास मच्छर होते हैं. ऐसे में मरीजों को ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है. जले हुए शरीर पर धूल, मिट्टी और मच्छर बैठने से होने वाले इन्फेक्शन से बचाव के लिए मरीज और परिजन को कई तरह के जतन करने पड़ रहे हैं. जबकि विशेष रूप से वार्ड डस्ट प्रूफ और आइसोलेटेड होना चाहिए. जिससे कमरे में धूल, मिट्टी और मच्छर मक्खियां न आ पाएं. साथ ही वार्ड में ठंडक के लिए एसी भी होनी चाहिए. इससे कमरे का तापमान मरीज के अनुकूल रखा जाता है. बर्न मरीज के लिए विशेष प्रकार के उपकरण भी होना चाहिए. जिससे उन्हें बिना वस्त्र पहनाएं भी बेड पर उपचार दिया जा सकता है.
पुराने एसएनसीयू का हो सकता है उपयोग
वर्तमान में जिस कमरे को बर्न वार्ड बनाया गया है. वह व्यवहारिक व इलाज की दृष्टिकोण से सुव्यवस्थित नहीं है. अस्पताल प्रशासन यदि बर्न वार्ड को सुव्यवस्थित तरीके से लोगों को सुविधा देना चाहे तो कुछ दिन पूर्व खाली हुए एसएनसीयु का उपयोग किया जा सकता है. इसमें वार्ड के चालू होने से जहां मरीजों को भी सुविधा मिलेगी. वही परिजन ठहरने के लिये प्रसव वार्ड के सामने में बने शेड का उपयोग कर सकते है. वर्तमान में बर्न वार्ड नहीं रहने के कारण मरीजों को निजी नर्सिंग होम में भरती होना मजबूरी है.
