पिछले दो माह के अंदर अलग-अलग चरणों में आंधी-पानी से बड़ा नुकसान
अभी प्रक्रियाधीन है अनुदान का प्रावधान, आस लगाए बैठे हैं जिले के किसान
पूर्णिया. मौसम की आफत से आहत जिले के मक्का किसानों को राहत नहीं है. पिछले दो माह के दौरान अलग-अलग चरणों में आयी आंधी, ओला और बारिश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा. मक्का की आमदनी से घर-परिवार को संवारने का सपना सजने से पहले बिखर गया. खेतों में धराशायी पड़े मक्का के पौधे पशुओं का चारा बनकर रह गये. एक तो पूंजी डूबी और उपर से कर्ज भी चढ़ गया. अब अगली फसल की तैयारी का सवाल सामने खड़ा है. हालांकि मक्का के नुकसान की भरपाई के लिए सरकारी तौर पर अनुदान का प्रावधान है पर अभी यह प्रक्रियाधीन है. आलम यह है कि अनुदान की आस में भी किसान अब हताश दिख रहे हैं.गौरतलब है कि जूट और केला के बाद मक्का इस इलाके का प्रमुख ‘कैश क्रॉप’ है. खुले बाजार में इसके डिमांड अधिक हैं और इसके दाम भी अपेक्षाकृत अधिक मिलते हैं. यही कारण है कि किसानों ने दूसरी फसलों में कटौती कर खुद को मक्का की खेती पर केन्द्रित कर लिया है. किसानों की मानें तो इस बार मक्का के दाम ज्यादा मिलने की उम्मीद थी और अधिक उत्पादन कर घर-परिवार की बड़ी जिम्मेदारियों के निर्वाह का मन बनाया था. मगर, मौसम की मार ने तमाम अरमानों पर पानी फेर दिया.अगर देखा जाए तो मार्च के आखिरी सप्ताह से आंधी-पानी का सिलसिला शुरू हुआ जो रुक-रुक कर लगातार जारी है.
खेतों में जमा पानी से कटाई भी हुई मुश्किल
इस आंधी-पानी के दौरान धीरे-धीरे जिले के खेतों में खड़े मक्का के तमाम पौधे धराशायी होते चले गये. किसानों की परेशानी तब और बढ़ गई जब खेतों में भी बारिश का पानी जमा हो गया. नतीजतन उसकी कटाई भी नहीं हो सकी. किसानों पर मौसम की मार इस कदर है कि एक तरफ जहां खेतों में पानी जमा रहने के कारण किसान मक्का की कटाई नहीं कर पा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ काट कर रखी गई फसल भी तैयार नहीं हो पा रही है. किसान मानते हैं कि तैयार नहीं हो पाने के कारण वह फसल भी बर्बाद हो जाएगी. इस बार का मक्का पशुचारा बन कर रह गया.आय की थी आस पर पूंजी भी डूबती दिख रही
जिले के रुपौली में रहने वाले मक्का किसान विपिन कुमार बताते हैं कि उन्होंने इस साल कुल तीन एकड़ खेत में मक्का का आच्छादन किया था. पौधे बड़े होकर खेतों में लहलहाने भी लगे थे और फलन और उसमें दाना आने का समय आ गया था. ठीक उसी समय आंधी और पानी की मार इस कदर पड़ी कि सभी पौधे धराशायी हो गये. अगर मौसम ठीक हो जाता तो उसके उपाय भी थे पर बारिश ने यह मौका ही नहीं दिया. अब तक खेतों में पानी जमा है जिससे कटाई भी संभव नहीं. अपनी पीड़ा बताते हुए विपिन कुमार कहते हैं कि तीन एकड़ की खेती में 1लाख की पूंजी लगी थी. फसल तैयार होने पर बाजार में इसके दाम कम से कम तीन लाख तक मिलने का अनुमान था पर यहां तो पूंजी भी चली गई. जलालगढ़ के किसान जितेन्द्र कुशवाहा की भी यही पीड़ा है. उनकी बड़ी परेशानी यह है कि अनुदान के लिए ऑनलाइन आवेदन भी नहीं कर पाए जिससे यह आस भी डूबती दिख रही है.कहते हैं अधिकारी
जिले में आंधी पानी से हुई फसल क्षति का विभागीय सर्वे कराया जा रहा है. इसके बाद ही प्रभावित किसानों को निर्धारित फसलों की क्षति का प्रतिशत देखते हुए सरकारी प्रावधान के अनुसार मुआवजा दिया जाना है.
हरिद्वार प्रसाद चौरसिया, जिला कृषि पदाधिकारी