चुनावी हलचल: चुनाव में गांवों के निठल्लो की बल्ले बल्ले

बेरोजगारों को मिल गया चंद दिनों का रोजगार, कर रहे मस्ती

बेरोजगारों को मिल गया चंद दिनों का रोजगार, कर रहे मस्ती

पूर्णिया. चुनाव क्या आया, गांवों में कल तक जो बेकार भटकते थे उन्हें काम मिल गया है. बेरोजगार युवाओं की सुधि भले ही अब तक किसी ने न ली हो पर चुनावी सरगर्मी के साथ उनके दिन फिर गये हैं. खास तौर पर गांव के उन निठल्लो की तो बल्ले बल्ले है जिन्हें देखकर गांव के लोग मुंह फेर लेते थे. चुनाव के दिन आए नहीं कि उनके लिए मौज मस्ती के दिन आ गये. अब वे अकड़ कर इस कदर चल रहे हैं मानो उन्हें कोई परमानेंट नौकरी मिल गई हो. हालांकि वे जानते हैं कि चंद दिनों तक ही उनकी मौज मस्ती है पर इसका वे अहसास नहीं होने देते. इधर, सियासी पार्टियों ने अपने हिसाब से इन निठल्लो का चयन किया है और सबको उनकी मेरिट के आधार पर काम भी दिया है. इसमें अगर कोई थोड़ा पढा लिखा और बातूनी है तो उसे गांव के चौक चौराहों पर होने वाली चुनावी चर्चा में घुसपैठ करने की जिम्मेदारी दी गई है जहां वे अपनी पार्टी के हितों और प्रत्याशी के बारे में चर्चा कर वोटरों का माइंड वाश करने में जुटे हुए हैं. सियासी पार्टियां इसे प्रचार का कारगर माध्यम मानती हैं. इनके अलावा ऐसे निठल्लो का एक बड़ा तबका ऐसा है जिसे पार्टी के प्रचार कार्यों में लगाया गया है. प्रेक्षकों की मानें तो निठल्लो की अकड़पन इसलिए भी है कि इनमें से अधिकांश को उनका मेहनताना पहले ही मिल चुका है. वैसे युवा असमंजस के साथ काम कर रहे हैं जिन्हें अभी सिर्फ खर्चा दिया जा रहा है और मूल भुगतान चुनाव के बाद करने का आश्वासन दिया गया है. उन्हें यह चिन्ता सता रही है यदि उनका प्रत्याशी हार गया तो कहीं भुगतान पेंडिंग न रह जाए. वैसे निठल्लो की तो बल्ले बल्ले है जो लग्जरी गाडियों पर बैठने का सपना देखा करते थे. ऐसे लोगों को पार्टी की ओर से न केवल कुर्ता पायजामा मिला है बल्कि चुनाव प्रचार के लिए स्कार्पियो जैसी गाड़ियां भी मिल गई हैं. यह अलग बात है कि ऐसे लोगों पर पार्टी प्रतिनिधियो की पैनी नजर रहती है.

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