छह दशक पुराना है पूर्णिया के नवरतन काली पूजा का इतिहास

पहले यहां बनती थी विशाल प्रतिमा अब प्रतिष्ठापित है स्थायी प्रतिमा

पहले यहां बनती थी विशाल प्रतिमा अब प्रतिष्ठापित है स्थायी प्रतिमा

यहां लगता है दूर दूर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता, जुटती है भीड़

यहां सजता है मां काली का दरबार, पूजाअर्चना कर मन्नतें मांगते हैं भक्त

पूर्णिया. शहर के नवरतन हाता में डीएसए ग्राउंड के ठीक बगल में मां काली का दरबार सजता है. इस काली स्थान का इतिहास करीब छह दशक पुराना है और आज भी यहां पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. पूरे शहर में यही वह पूजन स्थल है जहां वर्षों तक मां काली की विशाल प्रतिमा लगायी जाती रही और जिसके दर्शन के लिए दूर दूर से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता था. हालांकि भक्तों की भारी भीड़ अब भी जुटती है लेकिन अब प्रतिमा का स्वरूप स्थायी हो गया है और हर दिन मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है. विशेष तौर पर कार्तिक अमावस्या को यहां माता काली की पूजा ख़ास आकर्षण लिए होती है.

क्या है इतिहास

स्थानीय लोगों का कहना है कि सन् 1965 में यहां पूजन की परम्परा शुरु हुई. पुराने सदस्य बताते हैं कि पहले बंकिम चन्द्र घोष के पुत्र बच्चू घोष ने अपने घर पर ही पूजा की शुरुआत की थी. करीब पांच वर्षों तक यहीं पूजा हुई. इसके बाद यह पूजा नारी कल्याण समिति के प्रांगण में होने लगी पर कुछ साल बाद वर्तमान स्थल पर पूजा का आयोजन किया जाने लगा. उस समय अलख घोष, कन्हाई पाल, टोकन संटू दास, दिलीप कुमार घोष आदि ने आपसी सहयोग से परम्परा को आगे बढ़ाया. पूजन के इस आयोजन में पूरे समाज के लोग आगे आये और सक्रिय भागीदारी निभाते हुए मां का दरबार सजाना शुरु किया.

विशाल प्रतिमा के लिए हमेशा रहा चर्चित

यह काली स्थान देवी की काफी विशाल प्रतिमा को लेकर हमेशा लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा. लगभग दस से बारह फीट लंबी और करीब तीन फीट गोलाई के आकार में बनने वाली इस प्रतिमा को देखने के लिए भक्त दूर-दराज से यहां आते थे हालांकि पहले इतनी विशाल प्रतिमा नहीं बनती थी किन्तु 1990 से प्रतिमा को यह स्वरुप दिया गया. प्रतिमा के निर्माण के लिए बंगाल के मालदा से ही मूर्तिकार बुलाए जाते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षों पूर्व यहां देवी की स्थायी प्रतिमा स्थापित की गयी. मंदिर कमेटी के सदस्य बताते हैं कि वर्ष 2021 में स्थायी रूप से पत्थर की प्रतिमा स्थापित की गयी. इसके साथ ही मंदिर परिसर एवं भवन आदि का भी विस्तार पूर्वक निर्माण कराया गया जिसमें माता के श्रद्धालुओं का भरपूर योगदान रहा.

पूजन की बंग्ला संस्कृति

नवरतन काली स्थान में पूजन में बंग्ला संस्कृति की छाप साफ नजर आती है. प्रतिमा के साथ-साथ पूजा के मंत्रोच्चार में भी ऐसा ही देखा जाता है. स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां शुरु से ही दक्षिणेश्वर काली की पूजा होती है जिसके लिए बंगाल प्रसिद्ध है. यही वजह है कि मां के दर्शन के लिए यहां दूर-दराज के लोग आते हैं. माता का प्रसाद भोग के रूप में अनवरत चलता रहता है.

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम

नवरतन काली स्थान में पूजा के अवसर पर बड़े पैमाने पर कला और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. बच्चों के बीच तरह तरह की खेल प्रतियोगिताएं, नृत्य संगीत, पेंटिंग्स प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है. जिससे हर तबके के लोगों का जुड़ाव इस पूजनोत्सव से हो जाता है.

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