मुख्य बातें:
पूर्णिया के भवानीपुर से इंदेश्वरी यादव की रिपोर्ट
Supauli Bhagwati Temple History: बिहार के सीमांचल प्रक्षेत्र अंतर्गत पूर्णिया जिले का भवानीपुर प्रखंड एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक आध्यात्मिक धरोहर को समेटे हुए है. प्रखंड के सुपौली पंचायत में स्थापित ऐतिहासिक मां सुपौली भगवती मंदिर केवल स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों की आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह प्रक्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत की मुख्य पहचान बन चुका है. लगभग दो सौ वर्षों से अधिक समय से यहां विराजमान आपरूपी मां भगवती के दरबार में सालभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, वहीं शारदीय और चैत्र नवरात्र के पावन अवसरों पर यहाँ आस्था का विधिक जनसैलाब उमड़ पड़ता है.
मां के नाम पर पड़ा सुपौली पंचायत का नाम; ग्राम देवी से बनीं जगत जननी
इस पौराणिक मंदिर और इसकी सामाजिक कड़ियों से जुड़ी मुख्य जानकारियां इस प्रकार हैं. ग्रामीणों और प्रक्षेत्र के बुजुर्गों का कहना है कि मां सुपौली भगवती की आध्यात्मिक कमान इतनी व्यापक रही है कि इसी पावन मंदिर की पहचान के कारण इस पूरे देहाती क्षेत्र का नामकरण ‘सुपौली’ के रूप में हुआ.
प्राचीन समय में जब यह पूरा इलाका घने जंगलों, प्राकृतिक वनस्पतियों और जलधाराओं से घिरा हुआ था, तब आसपास के कली-मजदूर और ग्रामीण मां को अपनी ‘ग्राम देवी’ के रूप में पूजते थे. धीरे-धीरे मां की महिमा सुदूर प्रक्षेत्रों में फैली और यह स्थान पूरे सीमांचल की धार्मिक चेतना का मुख्य और सुचारू केंद्र संधारित हो गया.
जमींदार बाबूजन बाबू के सहयोग से कदई धार से निकाली गई थी दिव्य प्रतिमा
“बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर के उत्तर दिशा में बहने वाली ‘कदई धार’ (जलधारा) के भीतर मां भगवती की दिव्य प्रतिमा जलमग्न थी. एक रात मां ने प्रक्षेत्र के एक परम भक्त बाबूलाल ठाकुर को स्वप्न में लाइव दर्शन देकर विधिक आदेश दिया कि वे कदई धार में विराजमान हैं और उन्हें वहां से निकालकर मुख्य भूमि पर स्थापित किया जाए. इसके बाद बाबूलाल ठाकुर ने अपने भाइयों और तत्कालीन जमींदार बाबूजन बाबू से विचार-विमर्श कर ग्रामीणों की मदद से प्रतिमा को जलधारा से बाहर निकाला.”
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Supauli Bhagwati Temple History: आज भी होती है उसी आपरूपी मूल प्रतिमा की पूजा; छागर न्योछावर करने की परंपरा
इस सिद्ध पीठ की सबसे बड़ी विधिक विशेषता यह है कि यहां गर्भगृह में आज भी उसी मूल प्रतिमा की सुचारू पूजा-अर्चना की जाती है जो सदियों पहले कदई धार से प्राप्त हुई थी. मंदिर परिसर में किसी अन्य कनिष्ठ या कृत्रिम प्रतिमा की स्थापना नहीं की गई है, जो इस स्थान को अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट बनाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से मां के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रबुद्ध नागरिकों की हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है, जिसके बाद श्रद्धालु माता रानी को पारंपरिक प्रसाद अर्पित करते हैं तथा अपनी मन्नत पूरी होने पर श्रद्धापूर्वक छागर (बकरा) न्योछावर करने की विधिक परंपरा का संधारण करते हैं.
