पूर्णिया के बनमनखी से रामदेव की रिपोर्ट
Sikligarh Dharahara: भारतीय अध्यात्म और पौराणिक इतिहास में रुचि रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूर्णिया जिले का ‘सिकलीगढ़ धरहरा’ किसी महातीर्थ से कम नहीं है. पूर्णिया प्रमंडल मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर पश्चिम बनमनखी प्रखंड में स्थित भगवान नरसिंह का ऐतिहासिक मंदिर और ‘भक्त प्रह्लाद स्तंभ’ आज भी असीम श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. सतयुग की उस महान घटना (होलिका दहन और हिरण्यकश्यप वध) की गवाही देता यह स्थल आज भी अपने भीतर कई ऐसे रहस्य समेटे हुए है, जिसे देखकर आधुनिक विज्ञान और पुरातत्वविद भी हैरान रह जाते हैं. ‘आज का दर्शन’ अंक में हम आपको रूबरू करा रहे हैं इस दिव्य और चमत्कारी पौराणिक धरोहर से.
10 फुट मोटा चमत्कारी पाषाण स्तंभ; हाथियों से भी नहीं उखाड़ पाए थे अंग्रेज
- चमत्कारी प्रह्लाद स्तंभ: मंदिर परिसर में वर्तमान में जमीन से लगभग 8 फुट ऊंचा और 10 फुट मोटा गेंहुआ (धूसर) रंग का एक विशाल पाषाण (पत्थर) का स्तंभ मौजूद है. मान्यता है कि यह वही प्राचीन खंभा है, जिसे हिरण्यकश्यप ने लात मारी थी और उसके टूटते ही भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे.
- रहस्यमयी तरीके से बढ़ रही मोटाई: स्थानीय बुजुर्गों और संतों का दृढ़ विश्वास है कि इस स्तंभ की गोलाई और मोटाई में समय के साथ धीरे-धीरे स्वतः वृद्धि (विकास) होती रहती है.
- झुक गया पर उखड़ा नहीं: ब्रिटिश काल (अंग्रेजी शासन) के दौरान गोरे अधिकारियों ने अंधविश्वास और पुरातात्विक कौतूहलवश इस स्तंभ को जमीन से उखाड़ने की पुरजोर कोशिश की थी. इसके लिए कई शक्तिशाली हाथियों और घोड़ों को जंजीरों से बांधकर खिंचवाया गया, लेकिन स्तंभ टस से मस नहीं हुआ; हाँ, इस दबाव के कारण वह एक तरफ थोड़ा झुक जरूर गया, जो आज भी देखा जा सकता है.
- विशाल ऐतिहासिक गढ़: इस पौराणिक गढ़ का प्रत्येक भाग लगभग 25 फुट ऊंचा और 700 फुट लंबा है. स्थानीय जानकारों के अनुसार, करीब 60 वर्ष पूर्व यहां पुरातत्व विभाग द्वारा आंशिक खुदाई शुरू की गई थी, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से काम बीच में ही ठप कर दिया गया. इसके चलते इस ऐतिहासिक स्थल के कई रहस्य आज भी जमीन के गर्भ में दफन हैं.
देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं पर्यटक; राजकीय ‘होलिका महोत्सव’ का गौरव
सच्ची होली की उद्गम स्थली: इस स्थल की वैश्विक प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल बिहार या भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल और अन्य देशों से भी हजारों सनातन धर्मावलम्बी और सैलानी प्रतिवर्ष बनमनखी पहुंचते हैं. बनमनखी आने वाला हर आगंतुक सबसे पहले नरसिंह भगवान के चरणों में शीश नवाता है.
पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान:
बिहार सरकार द्वारा इस स्थल के पौराणिक महत्व को देखते हुए इसे धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ा गया है. यहां हर साल फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर भव्य ‘राजकीय होलिका महोत्सव’ का आधिकारिक आयोजन किया जाता है. इस महोत्सव के दौरान स्थापित परंपरा के अनुसार होलिका के एक विशाल सांकेतिक पुतले का दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है. इस ऐतिहासिक मेले और राजकीय समारोह में 10 हजार से भी अधिक श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है.
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और मंदिर कमेटी का कहना है कि सिकलीगढ़ धरहरा में अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने की पूरी क्षमता है. यदि केंद्र और राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग यहां दोबारा वैज्ञानिक खुदाई और सुंदरीकरण का कार्य शुरू कराए, तो यह स्थल विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान दर्ज करा सकता है.
