पूर्णिया जिले के अमौर प्रखंड में स्थित प्राचीन 'शिव दुर्गा मंदिर' केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है. मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि यहां सालों भर और विशेषकर नवरात्र के दौरान मन्नत मांगने और हाजिरी लगाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.
मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा शुरू करने वाला पहला पावन स्थल
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे अंचल में सबसे पहले मिट्टी की मूर्ति बनाकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की शुरुआत इसी शिव दुर्गा मंदिर से हुई थी. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु यहां श्रद्धापूर्वक छागर (बकरे) की बलि चढ़ाते हैं. मंदिर के प्रशासनिक संचालन की जिम्मेदारी प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) बतौर अध्यक्ष और थानाध्यक्ष बतौर सचिव संभालते हैं.
राजमहल से मंदिर तक बनी थी गुप्त सुरंग
मंदिर के पुजारी रामदेव गोस्वामी और स्थानीय बुजुर्ग मोहन झा ने मंदिर के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अमौरगढ़ कभी 'वक्र' नामक पहाड़ी नदी के किनारे बसा हुआ था. यह मार्ग अमौर को नेपाल और बंगाल से जोड़ता था. उस दौर में रामनगर ड्योढ़ी के राजा देवानंद अमौरगढ़ का संचालन करते थे. उन्होंने राजमहल के भीतर से मंदिर तक एक गुप्त सुरंग का निर्माण कराया था, जिससे होकर रानी सीधे पूजा-अर्चना करने मंदिर पहुंचती थीं. राजा देवानंद के बाद राजा दुलार, राजा परमानंद और राजा तीर्थानंद ने भी देवीधरा नामक इस स्थल पर मां दुर्गा की नियमित पूजा-अर्चना की.
मुढ़ी, घुघनी और जलेबी के बिना अधूरा रहता है मेला
मंदिर का ऐतिहासिक मेला भी अपनी अलग परंपराओं के लिए जाना जाता है. पहले दुर्गा पूजा की अष्टमी से शुरू होकर यह मेला काली पूजा तक यानी करीब एक महीने तक चलता था. मेले को लेकर एक रोचक परंपरा आज भी कायम है. माना जाता है कि माता के दर्शन और पूजा के बाद मेले में मुढ़ी, घुघनी और जलेबी खाने से परिवार में आपसी प्रेम और मेल-मिलाप बना रहता है. आज भी यहां आने वाले लोग इस परंपरा का पालन करना नहीं भूलते हैं.
