शारदीय नवरात्र आज से, पूजन अनुष्ठान की तैयारी को दिया गया फाइनल टच

पूजन अनुष्ठान की तैयारी को दिया गया फाइनल टच

पूर्णिया. कलश स्थापन के साथ ही सोमवार से शारदीय नवरात्र शुरू हो जाएगा. सोमवार से पूरे दस दिन यानी 2 अक्टूबर तक लोग मां दुर्गा की पूजा आराधना में जुटे रहेंगे. रविवार को श्रद्धालुओं ने इसकी तैयारी को अंतिम रुप दिया जबकि मूर्तिकारों ने प्रतिमाओं को फाइनल टच देने की कवायद भी तेज कर दी है. जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों की बाजारों में रविवार को शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के लिए लोग पूजन सामग्री की खरीदारी करते दिखे. इससे बाजारों में खूब चहल-पहल दिखी. देवी दुर्गा की आराधना के लिए जगह-जगह बनाये जा रहे पूजा पंडालों का निर्माण अंतिम चरण में है. मूर्तिकार मंदिरों व पूजा पंडालों में देवी दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं. सातवीं पूजा से पहले उन्हें अपना काम पूरा करना है. सोमवार की सुबह कलश स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और इसी के साथ दुर्गा सप्तश्लोकी के पवित्र मंत्रों से पूरा वातावरण गूंजने लगेगा. लोग दुर्गा मंदिरों, पूजा पंडालों और घरों में कलश स्थापित कर पूजा अर्चना करते हैं. कोई वैदिक पद्धति से पूजा करता है तो कोई तांत्रिक पद्धति से. देवी उपासना के यही दो मुख्य प्रकार माने गये हैं. शारदीय नवरात्र में कई लोग नौ दिनों का उपवास रखते हैं. इसमें उपवास की अहमियत मानी जाती है. पुरानी मान्यता है कि नवरात्र में उपवास रखने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और मनचाहा फल भी देती हैं. नवरात्र करने वाले कोई फलाहार कर पूरा नौ दिन गुजारेंगे तो कई सिर्फ पानी या शरबत का सेवन कर पूजन-अनुष्ठान में जुटे रहेंगे. इधर, रविवार से ही शहर में दुर्गा पूजा का माहौल बनने लगा है. दुर्गा पूजा को लेकर शहर के विभिन्न मंदिरों एवं पूजन स्थलों को अभी से सजाया-संवारा जाने लगा है. स्थायी मंदिरों में पूर्णिया सिटी स्थित पुरणदेवी मंदिर एवं पूर्णेश्वरी काली मंदिर में खास तैयारियां चल रही हैं. वैसे, शहर में दुर्गाबाड़ी, रजनी चौक, खजांचीहाट, बाड़ीहाट,मधुबनी, बैंक कालोनी, लायंस क्लब, जेल चौक, डोनर चौक, रामबाग, सिटी, खुश्कीबाग, गुलाबबाग आदि जगहों पर आकर्षक पूजन पंडाल बनाए जा रहे हैं जहां सोमवार की सुबह से ही मंत्रोच्चार गूंजने लगेगा. ऐसे करें कलश की स्थापना स्नान करने के बाद , मन और विचार को शुद्ध करते हुए आसन पर बैठें. आसन को मंत्र से शुद्ध करें, उसके बाद तीन बार आचमन करें. तिलक लगाएं ,दीप जलाएं . पुष्प, जल अन्य सामग्रियों को मंत्र द्वारा शुद्ध करें. स्वस्ति वाचन कर गणेश जी की पूजा करें. इसके बाद जहां पर कलश स्थापित करना है उस जगह पर जुताई किए हुए खेत या गंगा की मिट्टी रखें. उसके उपर कलश रखें. मंत्र के द्वारा कलश में जल डालें. कलश में सप्त मर्तिका कुश, द्रव्य, डालना है. उसके बाद उसमें आम्र पल्लव डालें. उसके उपर ढकना में अक्षत रखें. उसके ऊपर लाल रंग के कपड़ेे में नारियल लपेटकर रखें. इसके बाद कलश, का पूजन करें और मिट्टी में मंत्र के द्वारा जयंती के लिए जौ डालें. इसके बाद नवग्रह, पंचलोकपाल, दशदिग्पाल का पूजन करें. इसके बाद आप दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं. यह कलश स्थापना का सामान्य नियम है. दुर्गासप्तशती का पाठ केवल सिद्धकुंजिका स्त्रोत का पाठ करने से भी दुर्गासप्तशती के संपूर्ण पाठ का लाभ मिलता है. जिनके पास कम समय है उनके लिए पाठ का यह सबसे सुगम तरीका है. यदि विस्तार से पूजन करना हो, तो सबसे पहले शापोद्धार मंत्र पढ़े. उसके बाद सप्तश्लोकी दुर्गा का सातों श्लोक पढ़ें. फिर सिद्ध कुंजिका स्त्रोत का पाठ करें. इससे भी ज्यादा समय हो तो इन तीनों के अलावा कवच,अर्गला और कील का पाठ करें. इसके आगे बढ़ने पर उपरोक्त छहों के अलावा प्रथम अध्याय का पाठ कर सकते हैं. दूसरा, तीसरा और चौथे अध्याय का पाठ कर सकते हैं. पाठ के बाद क्षमा याचना जरूरी है. पूजा का महत्व दुर्गा जी का स्मरण करते हुए सप्तशती का पाठ करने से शक्ति और देवी की भक्ति प्राप्त होती है. भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है. कहा गया है कि दुर्गासप्तशती के पाठ से साकाम भक्त मनोवांछित दुर्लभ वस्तु या स्थिति को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं जबकि निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त करते हैं. इसके हर पाठ का अलग-अगल महत्व है और उसके अनुसार फल. सप्तशती में वर्णित है कि केवल दुर्गाजी के 108 नाम का नियमित पाठ करने वाले के लिए तीनों लोकों में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता है. किस दिन कौन सा फूल प्रथम पूजा- गुम्मा का फूल द्वितीय पूजा-अड़हुल का फूल तृतीय पूजा- कनेल का फूल चतुर्थ एवं आठवां पूजा- अनार छठा पूजा- अपराजिता सातवां पूजा- अड़हुल आठवीं पूजा- अनार का फूल नवमी पूजा : सभी तरह के फूल

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Author: ARUN KUMAR

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