युवा व्यवसायी की दिनदहाड़े हत्या से निजी बॉडगीर्ड के औचित्य पर उठ रहे सवाल
पूर्णिया
By ARUN KUMAR | Updated at :
पूर्णिया. हाल के वर्षों में प्राइवेट आर्म्स गार्ड रखने का पूर्णिया में काफी प्रचलन बढ़ा है. बड़े व्यवसायी हों या जमीन के कारोबारी, गार्ड रखना इनके लिये मजबूरी बन गयी है. यूं कहें कि अब प्राइवेट गार्ड रखना ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है. बॉडीगार्ड का यह दायित्व है कि हर हाल में अपने ऑनर की सुरक्षा का ध्यान रखना. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बॉडीगार्ड की आंखों के सामने उसके ऑनर की हत्या हो जाये, तो ऐसे गार्ड के रखने की क्या आवश्यकता है. बीते 27 जनवरी को गुलाबबाग के युवा व्यवसायी सूरज बिहारी की हथियारबंद लोगों ने उनके प्राइवेट गार्ड की उपस्थिति में गोली मार कर हत्या कर दी. इस घटना के बाद प्राइवेट गार्ड के औचित्य को लेकर शहर में चर्चा गर्म है. हलांकि घटना के बाद मक्का व्यवसायी के गार्ड ने अपनी सफाई में कहा कि उन्हें ऑनर ने ही हथियार को गाड़ी में रख देने को कहा था. अगर थोड़ी देर के लिए उसकी बात मान भी ली जाये तो क्या सुरक्षा के ख्याल से सतर्कता बरतना उसका काम नहीं था? लोगों का कहना है कि अगर वह ऑनर के पीछे हथियार लेकर खड़ा रहता तो ऐसी नौबत नहीं आती. घटना के समय जब तक गार्ड गाड़ी से हथियार लाने दौड़ा, तबतक बहुत देर हो चुकी थी.
शहर में सैकड़ों लोगों के है प्राइवेट गार्ड
जानकारी के अनुसार, शहर में लगभग 200 लोग ऐसे हैं, जिनके पास एक या एक से अधिक प्राइवेट गार्ड हैं. इनमें हर तरह के व्यवसायी और जमीन कारोबारी हैं. यहां अधिकांश गार्ड पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के रहनेवाले हैं. अधिकांश व्यवसायी किसी सुरक्षा एजेंसी के माध्यम से बॉडी गार्ड रखते हैं. इनमें एक बॉडी गार्ड पिस्टल और राइफल एक साथ रखते हैं जबकि कुछ के सिर्फ एक ही हथियार रहते हैं. हथियार और कद काठी के हिसाब से बॉडी गार्ड की सैलरी तय होती है. बताया जाता है कि यहां के जमीन कारोबारी प्राइवेट गार्ड को अन्य व्यवसायियों से अधिक वेतन देते हैं. इनके वेतन 45 हजार से 60 हजार रुपये प्रतिमाह होती है. इसके अलावा गार्ड के रहने एवं खाने की व्यवस्था भी ऑनर की जिम्मेदारी होती है. ज्यादातर जमीन के बड़े कारोबारी एक से अधिक बॉडी गार्ड रखते हैं. जमीन कारोबारी बताते हैं कि गार्ड रखना उनकी मजबूरी हो जाती है. रंगदारी मांगना और नहीं देने पर जमीन पर विवाद पैदा करना कुछ छुटभैइये अपराधियों की आदत बन गयी है. थाना की पुलिस हमेशा सुरक्षा नहीं दे सकती है.
नब्बे के दशक के बाद बढ़ा प्राइवेट गार्ड का क्रेज
अपने शहर में अलग अलग रसुकदार लोग हैं और सबका अलग-अलग तबका है. वीआईपी को छोड़ दें तो बीच के दौर में उद्योगपति और बड़े व्यवसायी सुरक्षा के नाम पर अपने साथ प्राइवेट गार्ड लेकर चलते थे. नब्बे के दशक में कई तो ऐसे शौकिन थे कि छह से आठ गार्ड की टीम लेकर चलते थे. गार्ड के लिये अलग चार चक्का गाड़ी की व्यवस्था करते थे. यह दौड़ खत्म हुआ, पर एक बार फिर सुरक्षा के नाम पर प्राइवेट गार्ड रखने का प्रचलन बढ़ गया. अभी यह क्रेज सबसे अधिक प्रापर्टी डीलरों में देखा जा रहा है. गार्ड का प्रचलन इस तरह बढ़ा है कि जेल से बेल पर बाहर आये बड़े अपराधी प्राइवेट गार्ड के साथ लोगों के बीच घूम रहे हैं.
सुरक्षा गार्ड रखनेवालों का होता है सत्यापन
दरअसल प्राइवेट गार्ड रखने वालों को इनकी लिखित जानकारी संबंधित थानों को देना अनिवार्य है. गार्ड के हथियार के लाइसेंस की कॉपी के साथ आधार कार्ड भी थाने में दी जाती है. दो वर्ष पूर्व एसपी के निर्देश पर सुरक्षा गार्ड रखने वाले कारोबारियों की सूची संबंधित थाने में दर्ज की गयी हे. गार्ड को संबंधित सभी जानकारी थाना में दी जाती है. ऐसा इसलिए कि अगर किसी प्रकार की गोलीबारी की घटना के बाद गार्ड भाग जाय तो पुलिस को उसकी सारी जानकारी रहनी चाहिए. थानेदारों के अनुसार अब बगैर थाने को सूचना दिये प्राइवेट गार्ड रखनेवालों पर पुलिस कार्रवाई करेगी.