पूर्णिया का दक्षिणेश्वर काली मंदिर: दर्शनमात्र से पूरी होती हैं मन्नतें, बिना बलि प्रथा के आंध्र के कारीगरों ने गढ़ी है भव्य वास्तुकला

पूर्णिया का रामबाग दक्षिणेश्वर काली मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. यहां दर्शनमात्र से भक्तों की हर जायज मन्नत पूरी होती है. इस मंदिर की अनूठी वास्तुकला और 64 वर्षों का इतिहास इसे खास बनाता है.

सीमांचल के प्रमुख केंद्र पूर्णिया जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सनातन आस्था और शक्ति उपासना के कई ऐतिहासिक मंदिर स्थापित हैं. इन सबमें पूर्णिया शहर के रामबाग स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर श्रद्धालुओं के बीच एक विशिष्ट स्थान रखता है. लोक मान्यता है कि इस पावन धाम में मां काली के दर्शनमात्र से भक्तों की सभी जायज मुरादें पूरी हो जाती हैं. यही कारण है कि यहां न केवल स्थानीय बल्कि सुदूर क्षेत्रों से भी माता के भक्त अपनी झोली फैलाने खिंचे चले आते हैं.

श्रद्धालुओं की अगाध आस्था: नहीं होती बलि प्रथा

रामबाग का यह शक्तिपीठ सिर्फ पूर्णिया ही नहीं बल्कि पूरे प्रमंडल के लोगों की अटूट श्रद्धा का केंद्र बिंदु बना हुआ है:

  • निर्मल सात्विक पूजा: इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सदियों से चली आ रही पारंपरिक पशु बलि की प्रथा पूरी तरह निषेध है. माता को प्रसन्न करने के लिए यहां केवल नारियल चढ़ाने की सात्विक परंपरा निभाई जाती है.
  • विशेष अवसरों पर हाजिरी: आम दिनों में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालुओं की आमद के अलावा, स्थानीय लोग अपने जीवन के विशेष पलों जैसे—जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ और नए वाहन की पूजा के लिए यहां आकर माता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते. इसके अतिरिक्त, प्रत्येक अमावस्या की रात को तांत्रिक व वैदिक रीती से विशेष पूजन अनुष्ठान आयोजित होता है.

वास्तुकला का बेजोड़ नमूना: आंध्र प्रदेश के कारीगरों ने तराशा

रामबाग स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर अपनी दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ-साथ स्थापत्य कला (Architecture) का भी एक अद्भुत और अनुपम उदाहरण पेश करता है:

  1. एक साल तक चली डिजाइनिंग: मंदिर की भव्यता और बाहरी नक्काशी में दक्षिण भारतीय मंदिर निर्माण कला की स्पष्ट झलक मिलती है. स्थानीय प्रबुद्ध बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर के नवनिर्माण के समय केवल इसकी बारीक डिजाइनिंग तैयार करने में ही एक वर्ष से अधिक का लंबा समय लगा था.
  2. कुशल कारीगरों का योगदान: इस मंदिर के भव्य ऊंचे शिखरों और दीवारों को नया स्वरूप देने के लिए विशेष रूप से आंध्र प्रदेश से दक्ष मूर्तिकारों और शिल्पकारों की टीम बुलाई गई थी, जिनके ठहरने और भोजन की मुकम्मल व्यवस्था मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा की गई थी.

शेड से भव्य शिखर तक: 64 वर्षों का गौरवशाली इतिहास

मंदिर के ऐतिहासिक सफरनामे पर नजर डालें तो इसकी स्थापना और जीर्णोद्धार की कहानी स्थानीय जनभागीदारी की एक सुंदर मिसाल है:

  • वर्ष 1962 (शुरुआती दौर): आज से ठीक 64 वर्ष पहले इस मंदिर की शुरुआत एक बेहद साधारण शेडनुमा ढांचे में हुई थी, जहां मां काली की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू की गई थी.
  • वर्ष 2006 (दिव्य स्वरूप): मंदिर के इतिहास में बड़ा मोड़ तब आया जब वर्ष 2006 में श्वेत संगमरमर की अत्यंत मनोहारी और भव्य प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई.
  • वर्ष 2022 (नूतन भव्यता): मंदिर का आधुनिक स्वरूप में संपूर्ण जीर्णोद्धार वर्ष 2022 में संपन्न हुआ. इस नवनिर्माण कार्य में रामबाग के स्थानीय नागरिकों और दानदाताओं ने बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया, जिसके परिणामस्वरूप आज यह मंदिर पूरे पूर्णिया शहर की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बन चुका है.

शारदीय व चैत्र नवरात्र सहित दीपावली के अवसर पर आयोजित होने वाली वार्षिक काली पूजा के दौरान इस पूरे परिसर को विद्युत सज्जा और फूलों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है, जिसमें लाखों की संख्या में भक्तों का सैलाब उमड़ता है.


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लेखक के बारे में

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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