पूर्णिया : पूर्णिया शहर के रामबाग स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र है. स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि मां काली के दरबार में सच्चे मन से मांगी गयी मन्नत पूरी होती है. यही विश्वास इस मंदिर को शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अलग पहचान देता है.
जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण इलाकों तक देवी के कई मंदिर हैं, लेकिन रामबाग का दक्षिणेश्वर काली मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वास्तुकला और इतिहास के लिए भी खास माना जाता है. यहां पूर्णिया ही नहीं, आसपास के इलाकों से भी श्रद्धालु मां काली के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.
रोज पहुंचते हैं सैकड़ों श्रद्धालु, खास मौकों पर बढ़ती है भीड़
दक्षिणेश्वर काली मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. लोग जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ और अन्य शुभ अवसरों पर भी यहां आकर मां काली का आशीर्वाद लेते हैं.
नवरात्र और काली पूजा के दौरान मंदिर में विशेष सजावट की जाती है. इन अवसरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ काफी बढ़ जाती है. वहीं, हर अमावस्या की रात मंदिर में विशेष पूजन और अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है.
यहां नहीं होती बलि की प्रथा, नारियल चढ़ाने की परंपरा
मंदिर की एक खास बात यह है कि यहां बलि की प्रथा नहीं है. श्रद्धालु मां काली को नारियल अर्पित कर पूजा करते हैं. मंदिर आने वाले भक्त अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना के बाद आशीर्वाद लेते हैं.
मंदिर से जुड़ी आस्था की खास बातें
- रामबाग स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर में प्रतिदिन श्रद्धालु पहुंचते हैं.
- नवरात्र और काली पूजा में विशेष आयोजन और सजावट होती है.
- हर अमावस्या की रात विशेष पूजन-अनुष्ठान होता है.
- जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगांठ जैसे अवसरों पर भी लोग पूजा करने पहुंचते हैं.
- मंदिर में बलि की परंपरा नहीं है.
- श्रद्धालु नारियल अर्पित कर मां काली की पूजा करते हैं.
आस्था के साथ वास्तुकला भी खींचती है ध्यान
दक्षिणेश्वर काली मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अपनी वास्तुकला के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. मंदिर को दूर से देखने पर इसकी बनावट और डिजाइन अलग नजर आती है. स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर की वास्तुकला तैयार करने में एक साल से अधिक समय लगा था.
बताया जाता है कि मंदिर निर्माण के लिए आंध्र प्रदेश से कुशल कारीगर बुलाये गये थे. मंदिर समिति की ओर से उनके ठहरने की व्यवस्था भी की गयी थी. स्थानीय लोगों की मानें तो मंदिर की डिजाइनिंग और निर्माण में विशेष कारीगरी का ध्यान रखा गया.
1962 में शेडनुमा था मंदिर, अब भव्य स्वरूप में है दक्षिणेश्वर धाम
दक्षिणेश्वर काली मंदिर का इतिहास करीब 64 वर्ष पुराना बताया जाता है. वर्ष 1962 में मंदिर का स्वरूप शेडनुमा था और यहां मां काली की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित थी.
समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदलता गया. वर्ष 2006 में संगमरमर की दिव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठापना की गयी. इसके बाद वर्ष 2022 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया.
मंदिर के पुनर्निर्माण में रामबाग के स्थानीय नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भागीदारी रही. स्थानीय लोगों ने सहयोग और आस्था के साथ मंदिर को नया और आकर्षक स्वरूप देने में योगदान दिया.
पूर्णिया में आस्था का खास ठिकाना
आज दक्षिणेश्वर काली मंदिर रामबाग और पूर्णिया के श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है. यहां आने वाले भक्त मां काली के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं. मंदिर की धार्मिक मान्यताओं, पुरानी परंपराओं और आकर्षक वास्तुकला ने इसे पूर्णिया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अलग पहचान दी है.
