पूर्णिया का ऐतिहासिक भूतनाथ मंदिर: छह दशकों से आस्था का बड़ा केंद्र, एक ही छत के नीचे होते हैं कई देवी-देवताओं के दर्शन

पूर्णिया शहर के हृदय स्थल में स्थित बाबा भूतनाथ मंदिर, सीमांचल के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है. छह दशक से अधिक पुराने इस सिद्धपीठ में शिव-पार्वती के साथ-साथ राधा-कृष्ण और बजरंगबली के भी दर्शन होते हैं.

पूर्णिया शहर के हृदय स्थल प्रभात कॉलोनी में अवस्थित देवों के देव और भूतों के नाथ भगवान भूतनाथ का मंदिर सीमांचल के श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा और आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. स्थानीय स्तर पर 'बाबा भूतनाथ मंदिर' के नाम से विख्यात इस पावन धाम में वैसे तो सालों भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन सावन के पवित्र महीने और महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां का नजारा किसी भव्य उत्सव में तब्दील हो जाता है.

जहां चौक का नाम भी बाबा के नाम पर पड़ा

भौगोलिक दृष्टिकोण से यह मंदिर पूर्णिया शहर के बीचों-बीच लाइन बाजार के समीप पंचमुखी चौक से रामबाग जाने वाली मुख्य सड़क के किनारे स्थित है. इस मंदिर की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय लोगों और भक्तों ने इस पूरे चौराहे का नामकरण ही मंदिर के नाम पर कर दिया है, जिसे अब पूरा शहर 'भूतनाथ चौक' के नाम से जानता है. सामान्य दिनों में दोपहर के वक्त यहां का शांत वातावरण राहगीरों और यात्रियों को गर्मी में सुकून और विश्राम की ठंडी छांव भी प्रदान करता है.

शिव-पार्वती के साथ राधा-कृष्ण और बजरंगबली के दर्शन

इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आने वाले भक्तों को एक साथ कई सनातन देवी-देवताओं की आराधना करने का सौभाग्य प्राप्त होता है:

  • मुख्य विग्रह: मंदिर के गर्भगृह में बाबा भूतनाथ (शिवलिंग) के साथ माता पार्वती विराजमान हैं.
  • अन्य देव प्रतिमाएं: परिसर में महाकाली, भगवान सिया-राम, राधा-कृष्ण और संकटमोचन हनुमान जी की अत्यंत भव्य एवं सजीव प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं.

पुजारियों के अनुसार, सबसे पहले यहां सिर्फ भोले बाबा की स्थापना की गई थी, जिसके बाद कालक्रम में अन्य देवी-देवताओं को लाया गया. दिन के हिसाब से अलग-अलग देवताओं के भक्त यहां विशेष पूजा-अर्चना के लिए जुटते हैं, जिससे मंदिर में सातों दिन रौनक बनी रहती है.

छह दशक पुराना इतिहास: टिन शेड से भव्य शिखर तक का सफर

स्थानीय बुजुर्गों और जानकारों के मुताबिक, इस सिद्धपीठ का इतिहास करीब छह दशक पुराना है. इस मंदिर की नींव वर्ष 1958 के आसपास रखी गई थी.

"शुरुआती दौर में यहां एक छोटा सा टिन शेड (कच्चा निर्माण) हुआ करता था. जैसे-जैसे बाबा की महिमा फैली, भक्तों के सहयोग से धीरे-धीरे इसका पक्कीकरण हुआ और क्रमवार तरीके से इसे एक वृहत और भव्य शिखर वाले मंदिर का स्वरूप मिला. यहां जो भी भक्त पूरी श्रद्धा के साथ बाबा भूतनाथ पर गंगाजल और दूध अर्पित कर मन्नत मांगता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है." — संजीव ठाकुर, मुख्य पुजारी, भूतनाथ मंदिर

मंडी और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु देवेन्द्र भारती और मुरारी मालाकार बताते हैं कि सावन के दौरान यहां सुरक्षा और महाप्रसाद की विशेष व्यवस्था की जाती है. सावन के हर सोमवार को यहां हजारों की संख्या में महिला और पुरुष श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए कतारबद्ध नजर आते हैं.


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लेखक के बारे में

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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