होली को लेकर घर लौटने लगे परदेशी बाबू, रेलवे स्टेशनों पर बढ़ी भीड़

रेलवे स्टेशनों पर बढ़ी भीड़

पूर्णिया कोर्ट व पूर्णिया जंक्शन व बस पड़ावों पर बढ़ी है आवाजाही

पूर्णिया और आसपास सरकारी नौकरी करने वाले बाहरी भी जा रहे घर

पूर्णिया. होली और छठ यही दो मौके होते हैं, जब परदेशी पिया गांव आते हैं. पंजाब के गांवों से, कोलकाता के चटकलों से और दिल्ली के बाजारों से …! साल भर की कमाई लेकर आते हैं और होली पूरी रंगीन हो जाती है. होली को लेकर घर लौटने वालों के कारण बसों व ट्रेनों का दृश्य कुछ अलग हो गया है. ट्रेनें भरी हुई आ रही हैं तो बसों में भी जगह नहीं और छोटी गाड़ियां भी खाली नहीं. न केवल काम करने वाले लोग बल्कि दूसरे प्रदेशों के कालेजों में पढने वाले इंजीनियरिंग व मेडिकल के छात्र, फौज में काम करने वाले रंगरूट और कंपनियों में काम करने वाले नौकरीपेशा लोग, सभी अपने घरों को लौट रहे हैं. गांवों में होली के साथ साथ बाहर से आने वाले लोगों के साथ चुहलबाजी भी हो रही है… कलकतवा से अइले हमार बलमू …! आलम यह है कि ट्रेनों में अचानक भीड़ बढने लगी है. दिल्ली और कोलकाता से आने वाली ट्रेनों में यात्रियों की भीड़ देखी जा सकती है. चूंकि लंबी दूरी की अधिकांश ट्रेनें कटिहार तक ही रहती हैं इसलिए कटिहार जोगबनी चलने वाली लोकल ट्रेनों में भी भीड़ बढ गई है. इधर, पूर्णिया और आसपास के इलाकों में काम करने वाले लोग भी अपने घर जा रहे हैं और भीड़ बढने की यह भी एक वजह है.

होली में घर आने वाले झेल रहे फजीहत

बाहर रहने वाले लोग होली पर घर तो लौट रहे हैं मगर उन्हें काफी फजीहत झेलनी पड़ रही है. हालांकि लंबे अर्से बाद घर लौटने की खुशी में फजीहत का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है पर परेशानी अपनी जगह स्थिर है. दरअसल, यह फजीहत उन्हें ज्यादा हो रही है जिन्होंने किसी अग्रसोची की तरह तीन चार महीने पूर्व ट्रेनों में रिजर्वेशन नहीं कराया था. तत्काल टिकट का आइडिया भी फेल हो गया तो जैसे-तैसे किसी ट्रेन पर चढ़ लिए. आलम यह है कि ट्रेनों में सीट मिलना मुश्किल है जिससे आने वाले ठेलमठेल झेलने को विवश हैं.

होली को लेकर बढ रहा उत्साह

होली पर नाते रिश्तेदारों के घर आने के साथ ही उत्साह भी बढ रहा है. पूर्णिया के भट्ठा बाजार की दुकानों पर खरीदारी करने वालों की भीड़ उमड़ रही है. रोज-ब-रोज महंगाई का रोना रोने वाले लोग भी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं. कपड़ों की दुकानों पर उमड़ने वाली भीड़ को तो देखिए, हर आदमी अपनी क्षमता के अनुसार कपड़े बनवा रहा है. ब्रांडेड कपड़ो की दुकानों पर भी उतनी ही भीड़ जुट रही है जितनी सामान्य दुकानों पर …!

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Author: SANJIT SHUKLA

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