जिला मुख्यालय के व्यस्ततम व्यापारिक और चिकित्सीय केंद्र लाइनबाजार में गंगा-दार्जिलिंग मुख्य सड़क मार्ग के किनारे स्थित शिवालय समूचे जिले का एक प्रमुख और जागृत आस्था केंद्र है.
महामाया मंदिर परिसर के भीतर स्थित इस ऐतिहासिक शिवाला के प्रति स्थानीय नागरिकों और सीमांचल के श्रद्धालुओं की असीम श्रद्धा जुड़ी हुई है. शहर के मुख्य मार्ग पर अवस्थित होने के कारण यहां सुबह से लेकर देर शाम तक पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है. न केवल स्थानीय मोहल्लों के निवासी, बल्कि इस व्यस्त मार्ग से होकर गुजरने वाले राहगीर व बाहरी यात्री भी भगवान भोलेनाथ के दरबार में शीश झुकाना कभी नहीं भूलते.
दर्शन मात्र से खुलते हैं भाग्य के द्वार, दूर-दराज से आते हैं श्रद्धालु
लाइनबाजार महामाया मंदिर परिसर स्थित इस शिवालय के बारे में जन-जन में यह अटूट मान्यता है कि यहां सच्चे हृदय से बाबा के दर्शन और नमन करने मात्र से दुर्भाग्य दूर होता है और सौभाग्य के बंद द्वार खुल जाते हैं.
यही वजह है कि भगवान आशुतोष के दिव्य विग्रह के दर्शन और जलाभिषेक के लिए ब्रह्ममुहूर्त से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला अनवरत शुरू हो जाता है. स्थानीय नागरिकों के अनुसार, शहर के अलग-अलग कोनों से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोग भी लाइनबाजार पहुंचने पर एक बार इस मंदिर में हाजिरी अवश्य लगाते हैं. बड़ी संख्या में श्रद्धालु ऐसे भी हैं जो प्रतिदिन नियमपूर्वक यहां जलाभिषेक कर अपने दिन की शुरुआत करते हैं.
मनोकामना सिद्धि के लिए होता है विशेष रुद्राभिषेक और शिव स्तुति
इलाके के बुजुर्ग बताते हैं कि इस शिवालय में निष्कपट भाव से की गई पूजा-अर्चना और रुद्राभिषेक से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
संतान प्राप्ति, रोग निवारण और पारिवारिक सुख-समृद्धि की मन्नतें लेकर भक्त यहां नियमित रूप से शिव स्तुति, रुद्राष्टकम और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करते हैं. सावन के पवित्र महीने और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर तो यहां तिल रखने की जगह नहीं होती, लेकिन सामान्य दिनों में भी सैकड़ों श्रद्धालु यहां दूध, गंगाजल, बेलपत्र और धतूरा अर्पित कर विशेष रुद्राभिषेक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं.
1966 में हुई थी स्थापना, 60 साल पुराना है पावन इतिहास
महामाया मंदिर परिसर में स्थापित इस दिव्य शिवालय का इतिहास छह दशक पुराना है. मंदिर के पुजारी पंडित अभयकांत झा बताते हैं कि इस पावन धाम की स्थापना वर्ष 1966 में की गई थी.
उसी समय विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पवित्र शिवलिंग के साथ-साथ आदि पराशक्ति माता पार्वती और प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की मनोहारी प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी. पूरे शिव परिवार की एक साथ उपस्थिति के कारण यहां का आध्यात्मिक आभामंडल अत्यंत प्रभावी है. मंदिर में दर्शन करने पहुंचे कई श्रद्धालुओं का कहना है कि शहर के भारी शोरगुल के बीच भी इस मंदिर परिसर के अंदर कदम रखते ही मन को अद्भुत आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है.
