पूर्णिया से अखिलेश चंद्रा की रिपोर्ट
Kushaha Kali Mandir: बिहार के पूर्णिया जिले में आस्था और अटूट विश्वास के कई केंद्र हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक मंदिर ऐसा है जिसकी महिमा हाईवे से गुजरने वाले हर चालक और यात्री के दिल में बसी है. हम बात कर रहे हैं पूर्णिया-सहरसा रूट में एनएच-127 (NH-127) पर सरसी और बनमनखी के बीच मुख्य सड़क के किनारे विराजमान प्रसिद्ध कुशहा काली मंदिर की. बनमनखी अनुमंडल मुख्यालय से महज पांच-छह किलोमीटर पहले स्थित इस सिद्धपीठ की महिमा अपरंपार मानी जाती है. यही वजह है कि इस व्यस्त लाइफलाइन सड़क मार्ग से गुजरने वाली तमाम छोटी-बड़ी गाड़ियां, बसें और ट्रक कुछ पल के लिए यहां स्वतः रुक जाते हैं. लोग अपनी यात्रा की सकुशलता के लिए मां महाकाली के दर्शन करते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं.
नदी का किनारा और हरा-भरा परिवेश; तीन दशक पूर्व बना भव्य मंदिर
- प्राकृतिक और शांत वातावरण: मंदिर के ठीक बगल से कल-कल करती कुशहा नदी गुजरी है. इसके आस-पास घने और छायादार पेड़-पौधे लगे हुए हैं, जिससे यह पूरा हाईवे स्ट्रेच बेहद हरा-भरा और रमणीय दिखाई देता है. लंबी यात्रा से थक चुके मुसाफिर अक्सर इन पेड़ों की छांव में बैठकर विश्राम करते हैं.
- झोपड़ी से भव्य मंदिर तक का सफर: मंदिर के इतिहास और मान्यताओं को लेकर कोई पुख्ता लिखित साक्ष्य या तिथि तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से माता की आराधना होती आ रही है. शुरुआत में मां एक छोटी सी फूस की झोपड़ी में विराजमान थीं.
- प्रशासनिक अधिकारी ने कराया निर्माण: जैसे-जैसे इस मार्ग से गुजरने वाले चालकों और भक्तों की मन्नतें पूरी होने लगीं, वैसे-वैसे मंदिर की ख्याति फैलती गई. बुजुर्गों ने बताया कि करीब तीन दशक पूर्व (लगभग 30 वर्ष पहले) इलाके के एक प्रशासनिक अधिकारी की मन्नत पूरी होने पर, उनकी व्यक्तिगत पहल से यहां इस भव्य और आकर्षक मंदिर का निर्माण कराया गया.
मनोकामना पूर्ति के लिए विख्यात; स्थापना काल से है बलि की परंपरा
सफर होता है मंगलमय: इस रूट पर चलने वाले कमर्शियल गाड़ी चालकों का अटूट विश्वास है कि कुशहा काली मां की शक्ति उनकी गाड़ियों की दुर्घटनाओं से रक्षा करती है. मंदिर में पूजा-अर्चना के विशेष विधान के तहत यहाँ स्थापना काल से ही पारंपरिक बलि देने की प्रथा भी निरंतर चली आ रही है. जब किसी श्रद्धालु की कोई बड़ी मन्नत या मनोकामना पूरी होती है, तो वे सपरिवार यहां आकर विशेष तांत्रिक या वैदिक पूजन अनुष्ठान आयोजित करते हैं और माता रानी को विशेष महाप्रसाद और बलि अर्पित करते हैं.
धार्मिक पर्यटन का केंद्र और वर्तमान स्थिति:
साधारण दिनों में तो यहाँ राहगीरों की भीड़ रहती ही है, लेकिन प्रत्येक शनिवार, मंगलवार और विशेष रूप से शारदीय व चैत्र नवरात्रि, रक्षाबंधन और दीपावली के अवसर पर होने वाली महाकाली पूजा के दौरान यहाँ का नजारा देखने लायक होता है. इन त्योहारों पर कोसी-सीमांचल के अलावा नेपाल और पश्चिम बंगाल से भी हजारों की संख्या में भक्त अपनी मुरादें लेकर यहाँ पहुंचते हैं और भारी चढ़ावा चढ़ाते हैं. एनएच-127 पर सफर करने वाले यात्रियों के लिए यह मंदिर आस्था के साथ-साथ मानसिक शांति का भी एक बड़ा पड़ाव बन चुका है.
