पूर्णिया से अरुण कुमार की रिपोर्ट
Rare Manuscripts: बिहार का सीमांचल क्षेत्र हमेशा से ही इतिहास, कला और अदब का एक समृद्ध केंद्र रहा है. इसी कड़ी में पूर्णिया जिले के अमौर प्रखंड स्थित ऐतिहासिक ग्राम हरिपुर से हमारी प्राचीन बौद्धिक विरासत से जुड़ा एक बेहद गौरवशाली अध्याय सामने आया है. भारत सरकार के अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम ‘ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि संरक्षण मिशन’ (National Mission for Manuscripts) के अंतर्गत जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रशासनिक दल ने हरिपुर का दौरा किया. इस विशेष अभियान का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में सदियों से सहेज कर रखी गई प्राचीन ज्ञान-परंपरा और लिपियों को खोजना व उनका संरक्षण करना है. इस दौरान टीम को मुगल काल और विभाजन-पूर्व पूर्णिया के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास से जुड़े कई चौकाने वाले और बहुमूल्य दस्तावेज हाथ लगे हैं.
प्रशासनिक दल ने किया दौरा; उर्दू और फारसी अनुवादक रहे मौजूद
- विशेषज्ञों की टीम: दुर्लभ कड़ियों को समझने और पुरानी अरबी, फारसी व उर्दू पांडुलिपियों का सटीक अनुवाद व व्याख्या (Interpretation) करने के लिए टीम में विशेष रूप से उर्दू अनुवादक वसीम अहमद अलीमी और सहायक उर्दू अनुवादक अब्दुल गनी को प्रशासनिक सदस्य के रूप में शामिल किया गया था.
- भव्य स्वागत: हरिपुर पहुंचने पर सीमांचल के विख्यात शोधकर्ता एवं साहित्यकार मौलाना रिजवान नदवी तथा वहां के ऐतिहासिक काजी परिवार के गणमान्य सदस्यों द्वारा प्रशासनिक दल का पारंपरिक स्वागत किया गया. इसके उपरांत काजी परिवार ने अपनी पीढ़ियों से सुरक्षित रखी गई दुर्लभ कॉपियों को जांच के लिए प्रस्तुत किया.
काजी नज्म हरिपुरी की हस्तलिखित रचनाएं और ‘आईना-ए-पूर्णिया’ का इतिहास
दुर्लभ दस्तावेजों का प्रदर्शन: बारीकी से किए गए अवलोकन के क्रम में इस धरोहर से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आए. काजी परिवार द्वारा विख्यात फारसी और उर्दू शायर काजी नज्म हरिपुरी की हस्तलिखित मूल रचनाएं, काव्य-पांडुलिपियां (Poetic Manuscripts) और कई ऐतिहासिक पत्र प्रशासनिक टीम के सामने प्रदर्शित किए गए. इसके अलावा काजी परिवार के गौरवशाली इतिहास और प्राचीन पूर्णिया के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को दर्शाते कई जमीनी दस्तावेज भी दिखाए गए.
मुगल काल से जुड़ा है हरिपुर का इतिहास; ‘ज्ञान भारतम’ पोर्टल पर सारा डेटा अपलोड
- गौरवशाली साहित्यिक परंपरा: इस अवसर पर इतिहास के पन्नों को पलटते हुए मौलाना रिजवान नदवी ने बताया कि हरिपुर का यह प्रतिष्ठित काजी परिवार मुगल काल से लेकर आज तक साहित्य, कला और सामाजिक नेतृत्व का मुख्य संवाहक रहा है. यह वही ऐतिहासिक भूमि है जिसका संबंध प्रसिद्ध ग्रंथ “आईना-ए-पूर्णिया” के लेखक से है. यहाँ मिली फारसी व उर्दू पांडुलिपियां और पत्र आजादी और विभाजन से पहले के अविभाजित पूर्णिया के सामाजिक जीवन, बौद्धिक परंपरा और गंगा-जमुनी तहजीब की एक मुकम्मल और खूबसूरत झलक पेश करते हैं.
डिजिटलीकरण और भविष्य का रोडमैप:
दौरे के अंत में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल ने इस खोज को जिले के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा:
“ज्ञान भारतम् मिशन का मूल उद्देश्य ही देश की खोई हुई या घरों में दबी प्राचीन ज्ञान-परंपरा और बौद्धिक विरासत का वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण (Digitization) और उसका व्यापक प्रसार सुनिश्चित करना है. यह पांडुलिपियां हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है.”
अधिकारी ने पुष्टि की कि हरिपुर में प्राप्त सभी दुर्लभ पांडुलिपियों और ऐतिहासिक पत्रों की हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनिंग कर ली गई है और संबंधित पूरा डेटा ‘ज्ञान भारतम’ के आधिकारिक राष्ट्रीय पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है, ताकि देश-विदेश के शोधार्थी (Research Scholars) प्राचीन पूर्णिया के इस समृद्ध इतिहास पर आगे अध्ययन कर सकें.
