पूर्णिया से सत्येन्द्र सिन्हा गोपी की रिपोर्ट
Mental Health Patients Growth: आधुनिक और भौतिकवादी युग की आपाधापी, अंतहीन आकांक्षाएं और पारिवारिक बिखराव आम लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहे हैं. जीएमसीएच पूर्णिया के मानसिक रोग विभाग से सामने आए ताजा आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं. अस्पताल के मनोरोग ओपीडी (OPD) में अमूमन हर महीने 600 से अधिक मानसिक रोगी परामर्श और उपचार के लिए पहुंच रहे हैं. इन मरीजों में बुजुर्गों और कामकाजी युवाओं से लेकर कम उम्र के बच्चे भी शामिल हैं, जिससे स्पष्ट है कि मानसिक अवसाद का दायरा समाज की सभी कड़ियों में तेजी से पैर पसार रहा है.
एंग्जायटी, सिजोफ्रेनिया और लोन का बढ़ता बोझ मुख्य कारण
- लोन और घरेलू तनाव: नौकरीपेशा और मध्यमवर्गीय युवाओं में मानसिक रोग की तहकीकात (केस हिस्ट्री) करने पर यह बात सामने आ रही है कि लोग विभिन्न प्रकार के ऋण (बैंक लोन/कर्ज) के बोझ और घरेलू कलह के कारण एंग्जायटी (Anxiety) और गंभीर डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं.
- नशाखोरी का असर: युवाओं के बीच तेजी से बढ़ते स्मैक, अफीम और अन्य मादक पदार्थों के सेवन ने उनके मस्तिष्क को बुरी तरह डैमेज किया है, जिससे वे सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) जैसे गंभीर मानसिक विकारों की कड़ियों से घिर रहे हैं.
“हर घर में बच्चों को बहलाने के लिए दिया जाने वाला मोबाइल उन्हें मानसिक रोगी बना रहा है. सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मौजूद अनियंत्रित कंटेंट के कारण बच्चे जिद्दी और हिंसक प्रवृत्ति के हो रहे हैं. देर रात तक जागने से उनकी नींद का चक्र और मानसिक विकास पूरी तरह बाधित हो रहा है.” — डॉ. नायाब अंजुम, मनोरोग विशेषज्ञ, जीएमसीएच
बच्चों से बचपन छीन रहा मोबाइल, 15 वर्ष से कम उम्र में स्क्रीन से दूरी जरूरी
मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार, 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को स्मार्टफोन की कड़ियों से पूरी तरह दूर रखना बेहद आवश्यक है, अन्यथा यह लत उनकी रचनात्मकता और सामाजिक व्यवहार को हमेशा के लिए समाप्त कर देगी.
बिना डॉक्टरी सलाह के दवा बंद करना जानलेवा, परिवार का संबल जरूरी
अस्पताल के मुख्य कप्तान (मनोरोग विशेषज्ञ) डॉ. नायाब अंजुम ने बताया कि मानसिक रोगों का इलाज काफी लंबा चलता है. इस बीमारी से पूरी तरह निजात पाने के लिए दवाओं के संधारण के साथ-साथ परिवार का संयम और संबल सबसे बड़ी औषधि साबित होता है. अक्सर देखा जाता है कि दवा शुरू होने के कुछ दिनों बाद मरीज की स्थिति सामान्य होने पर परिजन बिना किसी चिकित्सीय सलाह के दवाएं बंद कर देते हैं. दवा का कोर्स अचानक छोड़ना बीमारी को दोबारा और अधिक आक्रामक रूप में वापस लाता है, जिससे स्थिति बेकाबू हो जाती है. इसलिए डॉक्टरों की देखरेख में ही पूरा कोर्स संधारित किया जाना चाहिए.
